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अनोखा शौक: फौजी साजो-सामान के लिए कर्नल सूदन छानते हैं कबाड़ियों की दुकान, घर को बना दिया 'म्यूजियम'

Mon, 02 Oct 2023 07:07 PM IST
अलका त्यागी निशांत खनी, अमर उजाला, देहरादून
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फौजी साजो-सामान - फोटो : अमर उजाला
शौक अगर जुनून में बदल जाए तो फिर कुछ भी असंभव नहीं। एक फौजी के लिए तो कतई भी नहीं। देहरादून के रिटायर्ड कर्नल अनुपम सूदन ऐसे ही जुनूनी हैं। फौजी साजो-सामान से लेकर एंटीक कलेक्शन करने का उनका शौक रिटायरमेंट के बाद अब जुनून में बदल गया है। 

इंडियन आर्मी के एयर डिफेंस से 2021 में रिटायर्ड कर्नल अनुपम को फौजी साजो-सामान से बेइंतिहा लगाव है। सेवाकाल के दौरान इलाहबाद, जोधपुर और भाेपाल के कबाड़ियों से प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल ब्रिटेन, अमेरिकी, रूस, फ्रांस और जर्मनी के फौजियों का अद्भुत साजो-सामान का कलेक्शन किया है।

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रिटायर्ड होने के बाद कर्नल का जुनून इस कदर बढ़ गया कि एंटीक और फौजी साजो-सामान जुटाना ही उनका अरमान बन गया है। अधिकतर वक्त कबाड़ियों और कारीगरों की दुकानों में गुजर जाता है। कर्नल की दुनिया बाकी लोगों से एकदम अलग है। कबाड़ी आैर कारीगर ही उनके दोस्त हैं। 
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फौजी साजो-सामान - फोटो : अमर उजाला
देहरादून से दिल्ली तक कबाड़ियों के यहां छानते हैं खाक
दुनियाभर के फौजियों के सैन्य उपकरणों और एंटीक आइटमों की खोज में कर्नल सूदन की दौड़ देहरादून तक सीमित नहीं है। वह दिल्ली, दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ से लेकर जम्मू तक कबाड़ियों के यहां खाक छानते हैं। कर्नल का घर प्रथम-द्वितीय विश्व युद्ध के फौजी साजो-सामान से लेकर दुनिया के दुर्लभ आइटमों के अद्भुत म्यूजियम बन गया है। परिवार-रिश्तेदार उनको कबाड़ी बोलने लगे हैं। 
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फौजी साजो-सामान - फोटो : अमर उजाला
सेना के लिए हैं  एंटीक आइटम
म्यूजियम के उपकरण आम लोगों के लिए भले ही कबाड़ हों, लेकिन सेना के अफसर से लेकर एंटीक आइटमों के शौकीन अद्भुत कलेक्शन देखने पहुंचते हैं। सामान रखने जगह कम पड़ने पर कर्नल ने किरायेदार खाली करवा दिए हैं। तीन कमरों में एंटीक कलेक्शन है।

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फौजी साजो-सामान - फोटो : अमर उजाला
म्यूजियम में ऐसे अद्भुत आइटम 
स्टोव: द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिकी सेना इसका इस्तेमाल करती थी। स्टोव का एलुमिनियम का कवर ही खाना बनाने के लिए बतौर बर्तन इस्तेमाल होता था। मेडिकल स्टोव का उपयोग सर्जिकल उपकरणों को स्टेरीलाइज करने के लिए होता था।
कार्गाे एयर ड्राप आइंडिफिकेशन लाइट: यूएस आर्मी प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चें पर अपनी फौज तक रसद सामग्री और हथियार पहुंचाने के लिए इसका इस्तेमाल करती थी। कार्गाें से पैराशूट में सामान के साथ इस लाइट को अटैच कर छोड़ा जाता था। 
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फौजी साजो-सामान - फोटो : अमर उजाला
फोल्डिंग साइकिल : द्वितीय विश्व युद्ध में इंग्लैंड की आर्मी इसका इस्तेमाल करती थी। पैराशूट से कमांडो साइकिल के साथ जमीन पर लैंड करते थे। 6.5 किलो वजनी साइकिल से एक जगह से दूसरी जगह जाते थे। 1943 के युद्ध में ब्रिटिश आर्मी ने भी इसका इस्तेमाल किया। 
बैरोमीटर : 1919 में इंग्लैंड में बना बैरोमीटर प्रथम विश्व युद्ध में तोपखाने से गोलाबारी करने से पहले हवा की गति पता करने के लिए होता था। हवा का प्रेशर सटीक पता चलने पर ही निशाने पर गोले दागे जाते थे। 
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फौजी साजो-सामान - फोटो : अमर उजाला
वॉचमैन क्लॉक: यह अद्भुत घड़ी 1850 की है। इसके अंदर कागज का एक डायल लगा होता है। रात्रि गश्त में चौकीदार जिस-जिस इलाके में जाता था वहां पेड़ पर चाभी टंगी रहती थी। चाभी को घड़ी के डॉयल में लगाकर घुमाता तो अंदर कागज में उस जगह और समय पंच जाता था।
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