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16 साल बाद मां से मिला बेटा तो आंखों से बही 'ममता'

Thu, 16 Mar 2017 04:21 PM IST
सुनीत द्विवेदी / अमर उजाला, देहरादून
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subhadra - फोटो : amar ujala
छह साल की उम्र में बिछुड़ गई मां के अचानक मिल जाने से दुर्लभ और क्या हो सकता है? हजारों किमी फासला तय करके देहरादून नारी निकेतन पहुंचे दुर्लभ पतिर ऐसे ही भाग्यशाली बेटे हैं।
 
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16 साल पहले वह अपनी मां से बिछुड़ गए थे । मां भटक कर उत्तराखंड पहुंच गईं। आज 16 साल बाद जब सुभद्रा को ‘दुर्लभ’ दर्शन हुए तो दोनों की आंखें छलछला उठीं।
 
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नारी निकेतन में सोमवार को माहौल अन्य दिनों से जुदा था। सुभद्रा सुबह से टकटकी लगाए गेट की ओर देख रही थी। कुछ दिन पहले से ही उसकी जुबां पर यही था कि ‘मुझे घर जाना है’। जैसे ही कोई गाड़ी अंदर आती, वह गेट की ओर दौड़ पड़ती। घर जाने की खुशी में उसने सुबह से खाना भी नहीं खाया था।
 

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दोपहर ठीक 3.37 मिनट पर बेटा दुर्लभ अपनी मां को लेने के लिए पहुंचा। दोनों एक-दूसरे को दूर से देखते ही दौड़ पड़े। सुभद्रा-दुर्लभ गले लगकर रो पड़े। इसे देख वहां मौजूद लोगों की आंखों से भी आंसू निकल पड़े। बेटे ने अपने हाथ से मां को पानी पिलाया। फिर मिठाई खिलाई। दोनों के चेहरों पर खुशी साफ देखी जा सकती थी।
 
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इस दौरान सचिव भूपेंद्र कौर औलख ने मां-बेटे को उपहार देकर विदा किया। गौरतलब है कि डेढ़ बरस पहले ‘अमर उजाला’ ने संवासिनियों के उत्पीड़न के खुलासे के बाद नारी निकेतन में चली सुधारों की बयार में बड़ी संख्या में संवासिनियों की घर वापसी हुई। इस कड़ी में विभाग वर्ष 2014 से नारी निकेतन में जिंदगी काट रही सुभद्रा को उसके परिवार से मिलाने में कामयाब रहा। 
 
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दिसंबर 2014 में सूचना मिली कि मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला टिहरी बस अड्डे पर भटक रही है। जिसे नारी निकेतन की टीम देहरादून ले आई। इसके बाद उसका इलाज शुरू हुआ। दो साल तक चले इलाज के बाद सुभद्रा ठीक हो गई। जनवरी में उसने घर जाने की बात कही। 
 
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अपर सचिव (समाज कल्याण) मनोज चंद्रन ने बताया कि सुभद्रा की भाषा असम की लग रही थी। जिसके चलते इस साल जनवरी में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के साइंटिस्ट नीरज को बुलाया। जिस पर उसने बताया कि 60 वर्षीय सुभद्रा असम के धीमांजी जिले के बंगाड़ी जन लगासु गांव की रहने वाली है। इस बीच इंस्टीट्यूट में रूणा सिन्हा ट्रेनिंग के लिए पहुंचे। उन्होंने मिसिंग ट्राइब (जनजाति) असम निवासी बितुपन को सुभद्रा के बारे में बताया। जिसके बाद उन्होंने देहरादून में रिमिद से संपर्क किया। बस यहीं से सोशल साइट्स के जरिये सुभद्रा के परिजनों की खोज शुरू हो गई। उन्होंने सुभद्रा के परिवार को खोज निकाला। 
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सुभद्रा 16 साल बाद फिर अपने परिवार के पास पहुंच जाएंगी। पांच बच्चों को फिर से उनकी मां का ‘प्यार’ मिलेगा। दुर्लभ बताते हैं कि वह छह साल के थे। तब मां का इलाज चल रहा था। अचानक एक दिन मां गायब हो गई। रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने कहा कि अब सुभद्रा वापस नहीं आएगी। पर, मेरा दिल कहता था ‘मां’ जरूरी आएगी। जहां भी जाता मेरी नजरें मां को खोजती। इसी बीच जब सूचना मिली कि मां जिंदा है तो पहले यकीन न हुआ। फिर फोटो देख भरोसा हुआ। घर में जश्न मनाया। आज ऐसा लग रहा है मानो जन्नत मिल गई। 
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