पक्षियों की आवाज में जंगल का राज छिपा है। जूलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) के अध्ययन के मुताबिक, पक्षियों के स्वर के अध्ययन से यह पता चल जाता है कि जंगल घना है या विरल।
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साथ ही पक्षियों की आवाज से जंगल के अंदर का माहौल, जंगल में पक्षियों की प्रजातियां और बाघ, चीता आदि खतरनाक जीवों की निशानदेही भी हो जाती है। जेडएसआई ने उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल और अरुणाचल प्रदेश के जंगलों में पक्षियों की आवाज के साउंड पैटर्न का अध्ययन करने के बाद इस तथ्य का खुलासा किया है।
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जूलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया वर्ष 2005 से पक्षियों के स्वरों के सैंपल रिकॉर्ड कर रहा है। अब तक पांच प्रदेशों के पक्षियों के सैंपल रिकॉर्ड किए गए हैं। जब इन पक्षियों के स्वर के साउंड पैटर्न का अध्ययन बारीकी से किया गया तो बहुत से राज खुलते चले गए।
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अध्ययन में बताया गया कि एक ही प्रजाति का पक्षी जब घने जंगल में होता है तो उसकी आवाज के फ्रीक्वेंसी अलग हो जाती है। जब वह विरल जंगल में होता है तो ध्वनि के अवयव में बदलाव आ जाता है। यही पक्षी जब मैदानी क्षेत्र में आएगा तो उसकी ध्वनि के पैटर्न अलग हो जाएंगे। वहीं, अगर पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां हैं तो उनके साउंड पैटर्न अलग तरीके के हो जाते हैं।
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शोध प्रमुख और जेएडएसआई के वरिष्ठ पक्षी स्वर विशेषज्ञ डॉ. अनिल कुमार का कहना है कि पक्षी एक-दूसरे के स्वर की नकल करने की कोशिश करते हैं, जिससे उनके साउंड पैटर्न भिन्न हो जाते हैं। इससे पक्षियों की प्रजातियों के संबंध में पता चलता है।
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जंगल में खतरनाक जीव होने पर पैटर्न अलग तरीके के हो जाते हैं और साउंड फ्रीक्वेंसी भिन्न हो जाती है। साउंड पैटर्न से पक्षियों की धमनियों के संबंध में भी पता चलता है। उन्होंने बताया कि पक्षियों के स्वर सैंपल विशेष प्रकार के डिजिटल साउंड रिकॉर्डर से लिए जाते हैं। इससे साउंड पैटर्न श्रृंखला बाधित नहीं होती। सामान्य रिकॉर्डर से यह संभव नहीं है। इसकी रिकार्डिंग टुकड़ों में आती है।
पहले पक्षियों की आवाज के सैंपल डिजिटल साउंड रिकॉर्डर से लिए जाते हैं। एबी सॉफ्टवेयर के माध्यम से साउंड पैटर्न और इसकी संरचना निकाली जाती है। सोनोग्राम बनते हैं। इनकी फ्रीक्वेंसी का अध्ययन किया जाता है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि किस मनोभाव में स्वर निकला। पक्षी का मनोभाव जैसे-जैसे बदलता है, फ्रीक्वेंसी बदल जाती है। स्वर पैटर्न का अध्ययन स्थिति स्पष्ट कर देता है। पक्षियों के स्वरों में डर, खुशी, सामूहिकता आदि मनोभाव की फ्रीक्वेंसी अलग हो जाती है।