उत्तराखंड में कांग्रेस को दोबारा सत्तासीन करने की जिम्मेदारी पार्टी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) को मिलने जा रही है।
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बागी नेता
- फोटो : AmarUjala
टिकट बंटवारे से लेकर क्षेत्रवाद और जातिवाद समेत अन्य मुद्दों के अलावा चुनाव की रणनीति तय करना उनका प्रमुख एजेंडा होगा। बागियों के रूप में पार्टी छोड़कर गए कई बड़े नामों की कमी पूरी करने के साथ-साथ संगठन और सरकार के बीच मौजूद दरार भरना पीके के सामने दोहरी चुनौती के रूप में सामने आएगा।
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हरीश रावत
उत्तर प्रदेश के मुकाबले उत्तराखंड के चुनावी समीकरण बहुत उलझे हुए नहीं हैं। यहां मुख्य तौर पर कुमाऊं-गढ़वाल और ब्राह्मण-ठाकुर वोटों का गणित है। इन्हीं दो मोर्चों पर सफलता उत्तराखंड की सत्ता का सीधा रास्ता बनाती है।
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किशोर उपाध्याय
- फोटो : AmarUjala
कांग्रेस में साफ तौर पर अंदरखाने की रार नजर आती है। आए दिन दोनों पक्षों में मोर्चा खुला रहता है। आलाकमान के स्तर से भी इसे निपटाने के तमाम प्रयास भी विफल हो चुके हैं।
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हरीश रावत
- फोटो : Self
गढ़वाल क्षेत्र भी हरीश रावत सरकार में उपेक्षा का शिकार माना जाता है। बीते दिनों मंत्रिमंडल विस्तार में गढ़वाल को तरजीह देकर कुछ हद तक स्थिति बेहतर करने का प्रयास भी किया गया है। इन दोनों अहम बिंदुओं पर प्रशांत किशोर को अपनी काबिलियत दिखानी होगी। इसके अलावा प्रदेश प्रभारी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।
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कमलनाथ
कमलनाथ के नाम पर सहमति बनने की खबर दिल्ली से आई, लेकिन अभी तक उनकी ताजपोशी नहीं हुई है। ऐसे में प्रशांत किशोर को कई मोर्चों पर अपनी काबिलियत साबित करनी होगी।
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सतपाल महाराज
- फोटो : AmarUjala
अच्छी बात यह भी है कि हरीश रावत के कद का कोई नेता इस समय भाजपा में नजर नहीं आ रहा है। इसके अतिरिक्त बागियों के टिकट समेत अन्य मुद्दों पर चल रही कोल्ड वॉर भी प्रशांत किशोर के फेवर में रहेगी।
सूत्रों की मानें तो जल्द ही आलाकमान के स्तर से इस बाबत अधिकृत घोषणा हो सकती है। फिलहाल कांग्रेस के नेता पीके को उत्तराखंड की जिम्मेदारी दिए जाने के मुद्दे पर कुछ बोलने से बच रहे हैं।