1947 के बाद भारत-पाक के बीच बंटवारा हो गया लेकिन, तब से लेकर आज तक साबिर पाक का सालाना उर्स सरहदीं दूरियां मिटाता रहा। इस दरमियां कारगिल की लड़ाई, मुंबई में होटल ताज पर हमला, संसद पर आतंकी हमले जैसी कई घटनाओं के बाद सरहद पर तलवारें खिंची।
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बावजूद इसके हर बार साबिर पाक की धरती ने रुहानी और इंसानी फासले को मात दी और साल दर साल पाक जायरीनों का यहां पहुंचकर सजदा करने का सिलसिला जारी रहा। इस बार भी आज यहां 181 पाक जायरीनों की जत्था पहुंचेगा।
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जब पाकिस्तान का अस्तित्व नहीं था तब भी पिरानकलियर में अफगानिस्तान से लेकर तमाम मुल्कों के फकीरों को पिरान कलियर में आना-जाना लगा रहता था। 1947 में पाकिस्तान का बंटवारा होने के बाद दोनों देशों के बीच सरहदों की दीवार खड़ी हो गई लेकिन, इसके बाद कभी सरहदें साबिर पाक की इबादत और मोहब्बत करने वालों के कदम नहीं थमे।
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आजादी से पहले पाक से बिना किसी रोकटोक के यहां जायरीन आते थे। इसके बाद से वीजा लेकर यहां आने लगे। स्थानीय लोगों की मानें तो उन्हें ऐसा कोई मौका याद नहीं है जब उर्स के दौरान पाक के जायरीन यहां न पहुंचे हो। भारत-पाक की सीमा पर कितना भी तनाव रहा हो लेकिन, साबिर पाक से जुड़े दिली रिश्ते पर कभी आंच नहीं आई।
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उर्स में पाक जायरीनों की सुविधाओं के लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं। उनकी जियारत के समय अन्य जायरीनों को रोक दिया जाता है। सुरक्षा व्यवस्था का भी खास ख्याल रखा जाता है। यही कारण है कि जब भी पाक जायरीन यहां से लौटते हैं तो यहां मिले प्यार और इस्तकबाल से उनकी आंखें नम हो जाती है। इस बार भी पाक से 181 जायरीनों का जत्था आज शुक्रवार सुबह लोहौरी एक्सप्रेस से यहां पहुंच रहा है।
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साबिर पाक का सालाना उर्स देश-दुनिया में विशेष पहचान रखता है। दरअसल, उर्स शब्द फारसी भाषा से लिया गया है। इसका अर्थ है जश्न। साबिर पाक के परदा होने के बाद इसे जश्न के तौर पर इसलिए मनाया जाता है क्योंकि माना जाता है कि दुनिया से परदा होने के बाद उनकी मुलाकात अल्लाह के नबी से हुई थी। जिस तरह से शादी से पूर्व हल्दी और मेहंदी लगाकर समारोह की शुरुआत होती है।
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ठीक इसी प्रकार रबीउल अव्वल का चांद दिखते ही उर्स का आगाज हो जाता है। इसी दिन साबिर पाक की मजार पर मेहंदी डोरी की रस्म के तौर पर संदल (चंदन) और मेहंदी पेश की जाती है।