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बर्फ से ढके पहाड़ों से आगे यहां है स्वर्ग, तस्वीरें में देखें...

Wed, 08 Jun 2016 03:57 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, गढ़वाल
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
देवभूमि उत्तराखंड में बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच स्थित इस तीर्थ स्‍थल में जाकर लगता है कि अगर कहीं धरती पर स्वर्ग है तो वो यहीं है। हेमकुंड सा‌हिब यात्रा कुछ ऐसा ही अहसास कराती है। तस्वीरों में देखें...
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। वर्ष 2013 की आपदा के बाद इस वर्ष तीर्थयात्रियों की संख्या करीब पचास फीसदी तक बढ़ी है। वजह है अच्छा मौसम और सुविधाओं में इजाफा। गोविंदघाट से पुलना तक पक्की सड़क बनने से जहां यात्रियों को तीन किमी की खड़ी चढ़ाई से निजात मिली है, वहीं आगे पैदल मार्ग में भी सुविधाएं बढ़ी हैं। अमर उजाला ने इसका जायजा लिया।
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है।
हम जीप से महज बीस मिनट में ही पुलना गांव पहुंच गए। दरअसल अब गोविंदघाट से पुलना तक पक्की सड़क बन गई है। पहले यहां खड़ी चढ़ाई दम फुला देती थी। तीन किमी का यह पैदल सफर तय करने में ही तीन घंटे लग जाते थे। पुलना से शुरू हुई पैदल यात्रा। पूर्वाह्न साढ़े ग्यारह बजे हम हेमकुंड साहिब के पैदल ट्रैक पर निकल पड़े। पुलना से जंगल चट्टी तक पैदल मार्ग करीब छह फीट चौड़ा है। यहां एक ओर तीर्थयात्रियों को ढोते घोड़े चल रहे हैं तो दूसरी ओर पैदल तीर्थयात्री एक दूसरे का सहारा लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
करीब तीन किमी की दूरी एक घंटे में तय कर हम दोपहर साढ़े बारह बजे जंगल चट्टी पहुंचे। यहां डेढ़ किमी तक पैदल रास्ते के किनारे लक्ष्मण गंगा की ओर रेलिंग लगाई गई है। पुलना से जंगलचट्टी तक तीन रेन सेल्टर बनाए गए हैं, इनमें लोहे की कुर्सियां भी लगी हैं। आपदा के बाद बने ये सेल्टर यात्रियों को बड़ी राहत दे रहे हैं। तीन किमी के इस पैदल सफर में पेयजल की किल्लत यात्रियों को परेशान करती है। जंगलचट्टी पहुंचने पर ढाबों में खाने की संतोषजनक व्यवस्था है।
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
जंगलचट्टी में करीब दस मिनट का ब्रेक लेने के बाद हम निकल पड़े यात्रा के प्रमुख पड़ाव घांघरिया को। तीन किमी का सफर करीब डेढ़ घंटे का तय कर हम दोपहर दो बजे यात्रा के दूसरे पड़ाव भ्यूंडार पहुंचे। जंगल चट्टी से भ्यूंडार तक पैदल रास्ता कई जगहों पर आपदा से क्षतिग्रस्त हो गया था। अब यह रास्ता काफी हद तक ठीक हो गया है। सुधारीकरण का काम जारी है। भ्यूंडार में आपदा के निशां आज भी दिख रहे हैं। यहां लक्ष्मण गंगा में बड़े-बड़े बोल्डर अटके हुए हैं जो कभी भी हादसों का सबब बन सकते हैं।
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
आपदा में यहां स्थित दुकानें नदी के तेज बहाव में समा गई थी, अब स्थानीय लोगों ने यहां चट्टानी भाग पर दुकानें बनाई हैं। यहां बिजली-पानी की व्यवस्था सुकून देती है। लोनिवि ने लक्ष्मण गंगा पर अस्थाई पुल बनाया है। बरसात में इस पुल का सफर खतरे से खाली नहीं है। यहां एक पचास मीटर लंबा पैदल पुल भी बना है। तीर्थयात्री यहां प्रकृति के नजारों को अपने मोबाइल में कैद करते या नदी किनारे फोटो खिंचाते-नहाते दिखे। लक्ष्मण गंगा के तेज बहाव के बावजूद यहां सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। यात्रियों का इस प्रकार नदी किनारे नहाना और फोटो खींचना खतरनाक हो सकता है।
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
अब भ्यूंडार से यात्रा के मुख्य पड़ाव घांघरिया तक जाने के लिए पांच किमी की पैदल यात्रा बाकी थी। भ्यूंडार में करीब पंद्रह मिनट विश्राम लेने के बाद हम घांघरिया के लिए बढ़ गए। पांच किमी का यह सफर घने जंगल के बीच से होकर गुजरता है। यहां दो किमी के दायरे में कहीं भी न तो पेयजल की व्यवस्था है और न ही कोई प्राकृतिक पेयजल स्रोत। अलबत्ता रास्ते के किनारे बीस-बीस मीटर की दूरी पर बैठने के लिए कुर्सियां लगाई गई हैं। साढ़े चार किमी की दूरी पर कांजिला में दो हेलीपैड बनाए गए हैं।

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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
यहां हर बीस मिनट में हेलीकॉप्टर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हेलीकॉप्टर में जाने वाले तीर्थयात्री अपनी बारी के इंतजार में बैठे दिखे। इस प्रकार शाम चार बजे हम गोविंद धाम घांघरिया पहुंच गए। रागा प्रजाति के एबिज पिंडरो पेड़ों के मध्य घांघरिया पड़ाव स्थित है। यहां स्थानीय लोगों के होटल और ढाबे हैं। रात्रि विश्राम के लिए यहां गुरुद्वारे के साथ ही लॉज हैं, जहां एक रात में करीब पांच हजार तक तीर्थयात्रियों के रात्रि विश्राम की व्यवस्था है। पानी और बिजली के साथ ही दूरसंचार की डब्ल्यूएलएल सेवा उपलब्ध है। हर दुकान पर फोन की व्यवस्था होने से तीर्थयात्रियों को काफी सुविधा है।

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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
घांघरिया में रात्रि विश्राम कर अगले दिन चार जून को हम तड़के पांच बजे हेमकुंड के लिए निकल पड़े। घांघरिया से करीब दो सौ मीटर आगे लक्ष्मण गंगा पर पैदल पुल स्थित है। चट्टानी और कठिन रास्ता होने से अब यात्रा और रोमांचक हो गई। खड़े चट्टानी रास्ता दम फुला रहा था। तीर्थयात्री हर बीस मीटर पर थकान मिटा रहे थे। बाल श्रद्धालुओं के चेहरों पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। यहां मार्ग के किनारे रेलिंग लगी है, इसके सहारे ही यात्री आगे बढ़ रहे हैं।
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हेमकुंड साहिब यात्रा अब पटरी पर लौट गई है। - फोटो : amar ujala
चोटी पर स्थित निशान साहिब तीर्थयात्रियों का हौसला बढ़ा रहे थे। पांच किमी का सफर तय करने में पांच घंटे का समय लग गया। पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो गया। ठीक पौने दस बजे हम निशान साहिब तक पहुंच गए। निशान साहिब से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित हेमकुंड का पवित्र सरोवर और गुरुद्वारा साफ दिखाई देता है। कुछ देर यहां थकान मिटाने के बाद हेमकुंड साहिब पहुंच गए।
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