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भारत में यहां आज भी मौजूद है नागों की दुनिया, तस्वीरें...

Mon, 15 Jun 2015 10:21 AM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, देहरादून
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उत्तर भारत में नागों के गिने-चुने मंदिर हैं। इलाहाबाद का बासुकी नाग, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित भागसू नाग और किन्नौर स्थित पिरि नाग विकसित स्थलों पर होने के कारण पर्यटन से जुड़ चुके हैं, लेकिन उत्तराखंड में बागेश्वर के नाग मंदिर आज भी पहचान संकट का सामना कर रहे हैं। जबकि नाकुरी और कमस्यार के इलाके में कालिया नाग, फेणिल नाग और धवल नाग जैसे श्रेष्ठ नागों के आठ मंदिर और गुफाएं हैं।
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उत्तराखंड में आज भी है नागों की आबाद दुनिया, तस्वीरें...

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यहां नागों से जुड़ी कई रोचक मान्यताएं भी प्रचलित हैं, जिनसे लगता है कि पौराणिक काल में यहां नागों की आबाद दुनिया थी। अब भी यहां के लोगों में नाग देवताओं के प्रति गहरी आस्था है। क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार मानस खंड की नागपुरी ही नाकुरी पट्टी है, जो नव सृजित दुग नाकरी तहसील के अंतर्गत है। इसी से कांडा तहसील का कमस्यार क्षेत्र भी लगा है। नागों के मंदिर नाकुरी और कमस्यार क्षेत्र में तकरीबन सात किमी के दायरे में हैं।
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मान्यता है कि इस इलाके में नाग कन्याएं धौलीनाग (धवलनाग) की सेवा करती थीं और तल्ला कमस्यार में कुलूर नदी के किनारे कालिया नाग के पुत्र भद्रनाग का आवास था। जिन्होंने आदिकाल में वहां अपने लिए भद्रपुर की रचना की थी। यहां अब भद्रकाली गांव है और देवी भद्रवती का मंदिर है। भद्रवती मंदिर के नीचे एक विशाल गुफा है।

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मानस खंड में कहा गया है कि इस गुफा में नाग और नाग कन्याएं भद्रवती देवी की पूजा करते थे। मानस खंड में यह भी उल्लेख है कि कालिया नाग, तक्षक नाग, इलावर्त नाग और कर्कोटक नाग के पुत्र, पौत्र तथा वंशज इसी क्षेत्र में रहते थे। नागों के यह मंदिर प्राचीन काल के अन्य पाषाण मंदिरों की तरह ही थे। अब इनका आधुनिकीकरण हो चुका है।
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स्‍थानीय लोग गाय, भैंस का पहला दूध तथा हर फसल का पहला अनाज नाग देवता को चढ़ाते हैं। नाग पंचमी के दिन नाग मंदिरों में मेले लगते हैं, खीर का भोग लगाया जाता है। अक्तूबर की पंचमी को 22 हाथ लंबा चिराग जलाकर धौलीनाग मंदिर की परिक्रमा की जाती है। मान्यता है कि नाग देवता लोगों को संकट से उबारते हैं। (फोटो/स्टोरी: आनंद नेगी)
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