मसूरी में रिक्शा का इतिहास
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अंग्रेजों के अलावा मसूरी में रहने वाले राजा-रजवाड़े, नबाब, जागीरदारों के अपने रिक्शे और वेतनभोगी फाल्टू (मजदूर) होते थे। आजादी के बाद अंग्रेज चले गए। रजवाड़ों, नबाबों और जागीरदारों का वर्चस्व भी कम हो गया। यहां का व्यापारिक ढांचा चरमरा गया और कारखानों में रिक्शा बनाने वाले मजदूरों का काम लगभग ठप हो गया। 1950 के बाद प्रख्यात लेखक राहुल सांकृत्यायन ने मसूरी के मजदूरों की दुर्दशा को लेकर ''मजदूर संघ'' बनाया। 1960 में मसूरी में पर्यटकों की थोड़ी चहल-पहल बढ़ी तो मसूरी के रिक्शा मजदूरों का रोजगार चलने लगा।