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मुस्लिम समुदाय की इन बेटियों ने बदला समाज का नजरिया

Mon, 21 Dec 2015 04:39 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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बदलते परिवेश में मुस्लिम समुदाय की बेटियों का भी नजरिया बदला है। उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति भले ही कमजोर है, लेकिन उनका जज्बा आसमां छूने का है। आइए मिलते हैं ऐसी ही बेटियों से...
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मुस्लिम समुदाय की इन बेटियों ने बदला समाज का नजरिया

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देहरादून में मुस्लिम कॉलोनी की बीकॉम की छात्रा रुखसार सिद्दीकी बैंकिंग की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। वह रूंधे गले से बताती हैं कि अब्बू मौ. रिजवान का एक साल पहले कैंसर की वजह से इंतकाल हो गया। आठ बहनों और एक भाई के लालन-पालन और पढ़ाई का जिम्मा अम्मी रजिया के सिर आन पड़ा।
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तंगहाली के कारण बहन नरगिस 12वीं के बाद पढ़ाई नही कर पाई। सरकार की मदद से नाउम्मीद रुखसार का मकसद बैंकिंग के क्षेत्र में नौकरी हासिल कर बहन नरगिस की पढ़ाई शुरू कराना और अन्य बहनों को अच्छी तालीम दिलाना है।

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बीबीए की पढ़ाई कर रही चूडी बेचकर परिवार का पालन करने वाले सलीम की बेटी शीबा का सपना बिजनेस के क्षेत्र में मुकाम हासिल करना है। उसका दावा है कि सरकारी मदद मिले तो वह व्यवसाय के क्षेत्र में अच्छा कर दूसरों को भी रोजगार उपलब्ध करा सकती है।
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शाहनवाज की बेटी तरन्नुम बीए फाइनल की पढ़ाई करने के बाद एमए या टीचिंग की पढ़ाई करना चाहती है। 12वीं के बाद छात्रवृत्ति हासिल करने के लिए इनकम सर्टिफिकेट बनाने में होने वाली गड़बड़ी पर उसने दुख जताया। वह कहती हैं यह भेदभाव और भ्रष्टाचार खत्म हो तो बेटियां देश का नाम रोशन कर दें।
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12वीं की परीक्षा की तैयारी कर रही ऑटो मैकेनिक असलम की बेटी सायरा शिक्षा के क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाहती है। इसके लिए वह दिन रात पढ़ाई करती है। माजरा से कार्यक्रम में पहुंची फर्नीचर कारोबारी असांर सैफी की बेटी रहनुमा सैफी की बेटी 11वीं कक्षा में है। कामर्स की पढ़ाई कर वह चाटर्ड एकाउंटेंट बनना चाहती है।
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इसी तरह हाईस्कूल में 80 प्रतिशत अंक हासिल करने वाली सोनम का मकसद शिक्षा के नये आयाम गढ़ना है। ढेर सारी तमन्ना लिए यह बेटियां समाज के उस वर्ग से खासी नफरत करती हैं, जो बेटियों पर पाबंदी लगाना चाहता है। सरकार से उनकी मांग है कि छात्राओं की शिक्षा के लिए योजनाएं चलाए और उसमें पारदर्शिता बरती जाए। (चांद मोहम्मद/ अमर उजाला, देहरादून)
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