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मदर्स डे 2021 : विषम परिस्थितियों में अंधेरे को चीरकर बच्चों को दे रहीं चमकते भविष्य का उजाला, तस्वीरें

Sun, 09 May 2021 03:36 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal दीपक प्रजापति, अमर उजाला, हरिद्वार

सार

ऐसी संघर्षपूर्ण स्थिति में भी जब ममता की खुशबू परिवार की बगिया को महकाए रखे, तो निसंदेह उस मां के प्रति आदर और बढ़ जाता है। 
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मदर्स डे - फोटो : अमर उजाला
‘चलती-फिरती आंखों से अजां देखी है, मैंने जन्नत तो नहीं देखी, लेकिन मां देखी है।’ मशहूर शायर मुनव्वर राणा की ये पंक्ति ये बताने के लिए काफी है कि मां के आंचल की छाया में कितना सुकून मिलता है। मां सुनने में भले ही छोटा शब्द है, लेकिन इसका अर्थ बड़ा व्यापक है।
 
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मां की ममता के आगे उसके सभी बच्चे एक-समान होते हैं। ऐसी संघर्षपूर्ण स्थिति में भी जब ममता की खुशबू परिवार की बगिया को महकाए रखे, तो निसंदेह उस मां के प्रति आदर और बढ़ जाता है। कुछ ऐसी ही खास माताओं को सलाम करते हुए आज मदर्स डे पर अमर उजाला ने संजोई है उनकी प्रेरक कहानियां... 

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पति की बीमारी के बाद थामा ऑटो का स्टेयरिंग 

रानीपुर के विष्णुलोक कॉलोनी की रहने वाली सुमन जिले की पहली महिला ऑटो चालक हैं। पहले उनके पति सुनील सैनी ऑटो चलाते थे। मगर कुछ साल पहले उनके पति की टांगों में दिक्कत आ गई। इसके बाद घर चलाने के लिए दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस पर सुमन ने गृहस्थी का जिम्मा अपने ऊपर लिया और ऑटो के पहियों से अपनी जिंदगी की गाड़ी दौड़ानी शुरू कर दी।
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सुमन - फोटो : अमर उजाला
सुमन अपनी गृहस्थी को भी बखूबी चला रही हैं। साथ ही अपने बच्चों को भी पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने में जुटी हैं। सुमन का कहना है कि हौसलों के दम पर बड़ी से बड़ी मुश्किल को भी पार किया जाता है। 
 
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शिल्पा रावत - फोटो : अमर उजाला
लालढांग के मंगोला निवासी शिल्पा रावत आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। उनके पति 22 साल पहले घर छोड़कर चले गए थे। उस समय उनका एक तीन साल का बेटा था जबकि वह गर्भवती थीं। पति गए तो उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। शिल्पा ने बताया कि पति के जाने के बाद बच्चों की परवरिश में काफी दिक्कतें आईं। उनकी परिचित महिला ने शुरू में उनका सहयोग करते हुए स्कूल में नौकरी पर लगाया। इसके बाद गाड़ी वापस धीरे-धीरे पटरी आने लगी। 12 साल पहले उनकी नौकरी आंगनबाड़ी में लग गई। इसके बाद उन्होंने बच्चों की परवरिश के साथ ही अपनी नौकरी का भी ध्यान रखा। 

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शशी प्रभा तोमर - फोटो : अमर उजाला
कनखल स्थित महिला विद्यालय में प्रोफेसर शशी प्रभा तोमर खुद को शिक्षित हैं उन्होंने अपने बच्चों को भी ऊंची तालीम दिलवाई है। शशी प्रभा का बेटा उत्कर्ष इस समय मसूरी में आईएएस की ट्रेनिंग कर रहा है जबकि बेटी अदिति बंगलूरू में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। शशी प्रभा का कहना है कि मां तो अपनी सारी परेशानी बच्चों के लिए भूल जाती हैं। मां को तो याद ही नहीं रहता है कि उसने कितने कष्ट सहे हैं। जब एक मां के बच्चे कामयाब हो जाते हैं तो उसको यह नहीं पता रहता कि उसने बच्चों के लिए क्या किया है। 
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आशी नेगी - फोटो : अमर उजाला
भारत में हर वर्ष मई के महीने में मातृ दिवस मनाया जाता है। हमारे जन्म लेने से उनके अंतिम पल तक वो हमारा छोटे बच्चे की तरह ख्याल रखती है। हम अपने जीवन में उनके योगदान की गणना नहीं कर सकते हैं। मां अपनी जिम्मेदारियां बिना रुके और बिना थके निभाती है। मां ही होती है, जो अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करती है और उन्हें गलत रास्ते पर चलने पर एक गुरु की तरह अपने पास बुलाकर समझाती है। जब हमें बोलना भी नहीं आता था, तब भी हमारी तोतली जुबान से हर एक बात समझ जाती थी। मां का सम्मान करो, उससे बड़ा कुछ नहीं। मां के लिए और क्या लिखूं, उसने हमें खुद जो लिखा है। 
-आशी नेगी, शिक्षिका
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