ग्लोबल वॉर्मिंग के असर से पीने के लिए दूध नहीं मिलेगा। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 तक देश में दूध उत्पादन में 30 लाख टन की गिरावट आ सकती है।
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दूध
ग्लोबल वॉर्मिंग का सर्वाधिक विपरीत असर डेयरी सेक्टर पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। क्योंकि तापमान में वृद्धि होने से विदेशी नस्ल की गायों की दूध देने की क्षमता कम हो जाएगी।
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- फोटो : getty images
वर्तमान में विदेशी नस्ल की गायों से ही लगभग 80 फीसदी दूध की आपूर्ति हो रही है। इस समस्या से निजात पाने के लिए पशुपालन विभाग ने देसी गाय की ऐसी नस्ल तैयार करने की योजना बनाई है, जो अधिक दूध दे सके और जिस पर तापमान में वृद्धि का बहुत ज्यादा असर भी न पड़े। अगले तीन-चार साल के अंदर ऐसी नस्ल की गाय तैयार हो जाने की उम्मीद है।
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नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 तक देश में दूध उत्पादन में 30 लाख टन की गिरावट आ सकती है। वर्तमान में हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और डेयरी उद्योग से लगभग छह करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
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राधा मोहन सिंह
केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने भी पशुपालन विभाग से इस संकट का मुकाबला करने के लिए तैयारी शुरू करने का आह्वान किया है। सहकारिता सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में देसी गाय की कई ऐसी नस्ल हैं, जिन पर तापमान में वृद्धि का असर नहीं पड़ता।
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uttarakhand badri cow in NBAGR list
पशुपालन विभाग से उन्होंने ऐसी गायों की नस्ल को विकसित करने की योजना बनाने को तैयार करने के निर्देश दिए हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री के मुताबिक उत्तराखंड की बद्री गाय प्रदेश को इस संकट से बचा सकती है। जानकारी के मुताबिक पशुपालन विभाग बद्री गाय की ऐसी नस्ल तैयार करने की कोशिश में जुटा है, जो अधिक दूध भी दे सके।
प्रदेश में गायों की संख्या - लगभग 20 लाख
प्रदेश में प्रतिवर्ष लगभग 1565 हजार मीट्रिक टन दूध का होता है उत्पादन
प्रदेश में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता - 400 ग्राम प्रति व्यक्ति
तापमान बढ़ने से दूध के उत्पादन और प्रजनन क्षमता में गिरावट से सबसे ज्यादा गायों की विदेशी नस्ल और संकर प्रजातियां प्रभावित होंगी। भैंसों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग से देसी नस्ल की गाय सबसे कम प्रभावित होंगी। प्रदेश में अधिक दूध देने वाली देसी नस्ल की गाय की प्रजाति तैयार करने की योजना पर अमल कर चल रहा है।
- डॉ. एसएस बिष्ट, निदेशक, पशुपालन