2013 केदारनाथ आपदा ने देवभूमि का स्वर्ग कही जाने वाली फूलों की घाटी के सभी रास्ते बंद कर दिए थे। इन मार्गों पर ऐसी तबाही मची थी कि घाटी में सन्नाटा पसर गया था। अब तीन साल बाद एक बार फिर यह 'स्वर्ग' पर्यटकों से गुलजार हुआ है। सृष्टि के रचानाकार ब्रह्माजी का कमल कहा जाने वाला 'ब्रह्म कमल' भी यहां मिलता है। अमर उजाला डॉट कॉम के संवाददाता ने फूलों की घाटी का हाल जाना। पेश है रिपोर्ट...
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देवभूमि में यहां उगता है सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा जी का कमल
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brahm kamal
- फोटो : amar ujala / file photo
उत्तराखंड का राज्य पुष्प और पौराणिक मान्यताओं में भगवान ब्रह्मा जी का कमल कहा जाने वाला 'ब्रह्म कमल' फूलों की घाटी में खिलता है। जून 2013 की आपदा में रास्ते पूरी तरह तहस-नहस होने से वर्ष 2014 तक घाटी के द्वार नहीं खुले। पिछले वर्ष घाटी पर्यटकों के लिए खुली पर गिनती के ही पर्यटक वहां पहुंचे।
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अब स्थितियां तेजी से सुधरी हैं। विगत एक जून को घाटी के खुलने के बाद चौदह दिनों में 50 विदेशी सैलानियों समेत 732 पर्यटक फूलों के दीदार को पहुंच चुके हैं। यह संख्या तब है जबकि घाटी में अभी पर्याप्त संख्या में फूल नहीं खिले हैं। यहां फ्लावरिंग का सबसे उपयुक्त समय 15 जुलाई से 15 अगस्त माना जाता है।
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अमर उजाला डॉट कॉम के संवाददाता निकल पड़े फूलों की घाटी के पैदल ट्रैक पर। घाटी सुबह सात बजे से दोपहर दो बजे तक पर्यटकों के लिए खुलती है। नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क चेक पोस्ट पर नाम-पते दर्ज करवाकर अमर उजाला भी घाटी की ओर बढ़ गया।
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फूलों की घाटी में कदम रखते ही हमें सबसे पहले प्राइमूला (डेल्टी कुलाटा) और जंगली गुलाब के दर्शन हुए।
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इन फूलों की महक मन, मस्तिष्क को बेहद आनंदित करने वाली थी। फूलों की घाटी करीब दस वर्ग किमी में फैली हुई है। संपूर्ण घाटी का क्षेत्रफल 87.5 वर्ग किमी है जबकि लंबाई पांच किमी और चौड़ाई दो किमी है।
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- फोटो : amar ujala
घाटी में फूलों की 521 प्रजातियां खिलती हैं, लेकिन इन दिनों यहां करीब चालीस प्रजातियों के फूल खिले हैं।
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पोटिंटिला, मेरी गोल्ड, एनीमून, एपीलोवियम कायमियाना, कोरी डोलस कासमियाना, बुरांस की प्रजाति सेमरु के फूल हमें दिखे। छह साल में एक बार खिलने वाला फूल मेगाक्वाइपाइपा पोली एंड्रा इस बार खिला हुआ दिखा। यह फूल पांच से छह फीट लंबा होता है।
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फूलों की घाटी में प्राकृतिक रुप से फूलों की उत्पत्ति होती है। यहां बड़े-बड़े झरनों के साथ भोजपत्र का जंगल दूर-दूर तक फैला है। घाटी चारों ओर से पर्वत श्रृंखलाओं से ढकी हुई है।
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यहां फूलों की उत्पत्ति ऐसे हो रही है, जैसे फूलों की क्यारियां बनाई गई हों। टिपरी ग्लेशियर से पुष्पावती नदी निकलती है, जो घाटी के एक किनारे से बह रही है। यहां फूलों के साथ ही वन्य जीवों में स्नो लेपर्ड, कस्तूरा मृग, मोनाल, हिमालयन थार, ब्ल्यू शिप और ब्लैक बियर भी पाए जाते हैं।
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- फोटो : amar ujala
चार जुलाई 1939 को फूलों की घाटी पर रिसर्च करने पहुंची इंग्लैंड की जोन मेरी की घाटी में ग्लेशियर के नीचे दबने से मौत हो गई थी। यहां बुग्यालों के बीच मेरी की कब्र बनाई गई है, जिसे देखने के लिए विदेशी पर्यटक यहां पहुंचते हैं। मेरी की कब्र पर स्थापित संगमरमर के पत्थर पर लिखा गया है कि ‘मेरी दृष्टि हिमालय के उन शिखर पर जाएगी, जहां से मुझे शक्ति आई है।’