हिमालयन वियाग्रा के नाम से मशहूर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली यारसागंबू (कीड़ाजड़ी) अब सीमा की सुरक्षा में खतरा बन रही है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में इसके तस्करों का मकड़जाल फैला है।
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यारसागंबू की खोज करते ग्रामीण
- फोटो : अमर उजाला
चीन बड़े पैमाने पर उच्च हिमालयी क्षेत्र से कीड़ा जड़ी की तस्करी करवाता है, ये तस्कर सीमा पर चोर रास्तों से तस्करी करते हैं। यारसागंबू के नाम से बिकने वाली इस जड़ी की चीन में बहुत डिमांड है। यह जड़ी 15 लाख रुपये प्रति किलोग्राम में बिकती है।
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उच्च हिमालयी क्षेत्र में सैकड़ों कीड़ा जड़ी तस्करों के कैंप की तस्दीक भारतीय वन्य जीव संस्थान की शोध रिपोर्ट में की गई है। कीड़ा जड़ी तस्करों के साथ वन्य जीवों की तस्करी करने वालों ने भी उत्तरकाशी, चमोली आदि जिलों की चीन सरहद के नजदीक इलाकों में अपने अड्डे बना रखे हैं।
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वन्य जीवों पर शोध के दौरान भारतीय वन्य जीव संस्थान की टीमों को सैकड़ों की संख्या में कीड़ा जड़ी इकट्ठे करने वालों के कैंप दिखे हैं। इसका जिक्र संस्थान के विज्ञानियों ने अपनी शोध रिपोर्ट में भी किया है।
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इन कीड़ा जड़ी कैंपों के संबंध में स्थानीय प्रशासन को कोई सूचना नहीं मिल पा रही है। चीन में कीड़ा जड़ी का दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है।
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संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि कीड़ा जड़ी तस्करों के सीमा पर गोपनीय रास्तों का इस्तेमाल राष्ट्र विरोधी विदेशी घुसपैठिये भी कर सकते हैं। कीड़ा जड़ी तस्करों के साथ वन्य जीव तस्करों का भी गठजोड़ है।
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों से कस्तूरी मृग, बाघ आदि वन्य जीवों की तस्करी की जाती है। इन तस्करों का अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से गठजोड़ है। वन्य जीव तस्करों की इन गतिविधियों का मामला स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की बैठक में उठ चुका है।
बोर्ड से उच्च हिमालयी क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम करने के लिए कहा गया। प्रमुख वन्य जीव प्रतिपालक डीबीएस खाती का कहना है कि वन्य जीव तस्करों को पकड़ने के लिए आईटीबीपी, बीएसएफ, पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम बनाई गई है।