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केदारनाथ आपदा की खौफनाक आपबीती: लाशों के ढेर पर रात काटना...वो मंजर, वो स्याह तस्वीर

Mon, 17 Jun 2019 02:13 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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kedarnath, disaster - फोटो : फाइल फोटो
बदरी केदार मंदिर समिति के तत्कालीन अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने अमर उजाला से उस स्याह रात की खौफनाक सच्चाई बयां की। उन्होंने बताया  17 जून 2013 की शाम को यह सुगबुगाहट शुरू हो गई थी कि केदारनाथ में कुछ अनहोनी हुई है। मगर किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी। न सरकार को कुछ पता था, न उसके तंत्र के पास कोई सूचना थी।
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kedarnath, disaster - फोटो : फाइल फोटो
कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत 18 जून को केदारनाथ पहुंचे और लौटकर उन्होंने जो कुछ बताया, वह पैरों तले जमीन खिसकाने वाला था। कहा कि मैं तुरंत केदारनाथ जाना चाहता था, लेकिन श्रीनगर में भी आपदा का कहर कुछ कम नहीं टूटा था। क्षेत्रीय विधायक होने के नाते लोगों की यहां भी उम्मीदें थी। केदारनाथ जाने की बेचैनी थी, लेकिन श्रीनगर में राहत कार्यों में 20 जून तक फंसा रह गया। 21 जून वो दिन था, जिस दिन केदारनाथ जाने की स्थिति बनी।
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kedarnath, disaster - फोटो : फाइल फोटो
मैं और मेरे साथ मेरे पीआरओ वीरेंद्र नेगी को हेलीकाप्टर से केदारनाथ में ड्राप कर दिया गया। दारुण दुख और खौफनाक मंजर की मिली जुली तस्वीर ने कुछ समय के लिए हमें जड़ कर दिया। हर जगह लाशों के ढेर, हर तरफ मरघट सा माहौल। हम दोनों सीधे मंदिर के गर्भगृह में घुस गए। यहां भी कई शव पडे़ थे।

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kedarnath, disaster - फोटो : अमर उजाला
पूरे केदारनाथ में हम दो लोगों के अलावा एक और तीसरा व्यक्ति, जो कि वहां का स्थानीय था मौजूद थे। सबसे पहले गर्भगृह की पवित्रता बहाली का प्रश्न सामने खड़ा था। हम तीनों ने गर्भगृह में रखे शवों को खींचकर बाहर लाना शुरू किया। गर्भगृह की सफाई शुरू की, उन स्थितियों में जितना हमसे हो सकता था, उतनी सफाई की। शाम तक ऐसा ही चलता रहा।
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kedarnath, disaster - फोटो : फाइल फोटो
पूरा दिन गर्भगृह में सफाई में जुटे रहने के बाद रात कहां काटी जाए, ये सवाल सामने था। हम तीनों एक खाली धर्मशाला में घुस गए। यहां पर खाने पीने का पूरा सामान सुरक्षित था, लेकिन धर्मशाला के ग्राउंड फ्लोर शवों से अटा पड़ा था। यह हमारे अपने लोगों के शव थे, जो मोक्ष और पुण्य प्राप्ति की कामना में यहां तक चले आए थे।
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kedarnath, disaster - फोटो : फाइल फोटो
रात भर नींद नहीं आई। करवट बदलते रहे, चहलकदमी करता रहा। किसी तरह रात कटी। ऐसी रात जिंदगी में कभी नहीं गुजरी, इतनी भयानक, इतनी खौफनाक। अगली सुबह का इंतजार सिर्फ एक लक्ष्य के साथ कर रहा था। मंदिर में खंडित पूजा को फिर से शुरू करना। धर्मशाला में पूजा इत्यादि सामग्री भी सुरक्षित थी।
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हम तीनों फिर से गर्भगृृह पहुंचे। शिवलिंग को साफ किया और वहां पर दीपक प्रज्वलित कर दिया। स्थानीय युवक को मैंने मंदिर समिति के अध्यक्ष की हैसियत से यह जिम्मेदारी सौंपी कि वह इस दीपक की लौ को तब तक जरूर बचाए रखेगा, जब तक पूजा अर्चना की समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती।

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हमें ये सूचना मिली की मंदिर के पास ऊंचाई वाले स्थान में एक झील के पास कुछ लोग जीवित हैं। वह जान बचाकर ऊंचाई वाले स्थान की तरफ भागे थे। हम वहां पहुंचे, तो हमें 28 लोग जीवित मिले। एक ऐसा परिवार भी था, जिसमें मां बाप मर गए थे और बेटे बहू जीवित थे। बेटा अपने मां बाप के शव को छोड़कर जाने को तैयार नहीं था। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया।
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28 लोगों को लेकर हम नीचे की तरफ आए। एक धर्मशाला में रुकवाया। 26 जून तक हम लोग केदारनाथ में ही थे। हेलीकाप्टर से लोगों को निकाला जाने लगा था। 27 जून को मैं अपने पीआरओ के साथ देहरादून लौट आया। छह वर्ष बीत चुके हैं, जब भी केदारनाथ आपदा की बरसी को याद करता हूं सिहर जाता हूं। खौफनाक यादें आज भी जेहन में ताजा हैं।

(बदरी केदार मंदिर समिति के तत्कालीन अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने जैसा अमर उजाला के प्रमुख संवाददाता विपिन बनियाल को बताया।)
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