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पहाड़ों की अद्भुत परंपरा, तस्वीरों में देखिए कैसे जलते अंगारों पर नाच उठे देवता

Tue, 18 Apr 2017 09:22 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, गुप्तकाशी
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jakh mela
जलते अंगारों के कुंड में जैसे ही जाख देवता ने प्रवेश कर नृत्य करना शुरू किया तो पूरी केदारघाटी यक्षराज (जाख देवता) की जयकारों से गूंज उठी। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु मौजूद थे। नृत्य के बाद कुंड की पावन राख को श्रद्धालु अपने- अपने घर ले गए।
 
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jakh mela - फोटो : amar ujala
शनिवार को जाखधार में तीन दिवसीय आयोजित जाख मेले के अंतिम दिन सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी।
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दोपहर को यक्षराज जाख देवता के पश्वा (मदन सिंह) ढोल-दमाऊं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ नारायणकोटि गांव से नृत्य करते हुए कोठेड़ा और देवशाल होते हुए ढाई बजे जाख मंदिर में पहुंचे।
 

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मंदिर परिसर में पुजारियों ने देवता की विशेष पूजा-अर्चना कर वैदिक मंत्रोच्चारण और वाद्य यंत्रों से आह्वान किया। दोपहर करीब ढाई बजे 10 से अधिक ढोल-दमाऊं की जोड़ियों की थाप और रणसिंह की गर्जना के बीच जाख देवता ने अग्निकुंड में नृत्य कर उसके कई चक्कर लगाए।
 
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jakh mela
यह दृश्य देखने के लिए सुबह से भी मंदिर में एकत्रित होने लगे थे। मंदिर परिसर में बीते तीन दिन से आयोजन की तैयारियां शुरू हो गई थी। कोठेड़ा के पुजारियों, देवशाल के वेदपाठियों और नारायणकोटि के सेवक- श्रद्धालुओं द्वारा जाख मंदिर परिसर में अग्निकुंड की रचना की गई।
 
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सांकेतिक चित्र
बैसाख संक्रांति की दोपहर को अग्नि प्रज्ज्वलित कर अग्निकुंड की रात्रि के चार पहर विशेष पूजा की गई। जाख मेला समिति के रेवती नंद देवशाली, आत्मराम बहुगुणा, भूपाल सिंह ने सफल आयोजन के लिए क्षेत्रवासियों का आभार जताया। इधर, मनोहर देवशाली बताते हैं कि जाख देवता 11 गांवों के आराध्य देवता हैं। बताया कि देवता के अग्निकुंड में नृत्य की परंपरा नौ सौ वर्ष पुरानी है। 
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