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उत्तराखंड के इस गांव में प्रधान, ग्राम प्रहरी और राशन डीलर तक सब महिलाएं

Tue, 08 Oct 2019 08:27 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बैंग्वाड़ी (पौड़ी)
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- फोटो : अमर उजाला
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पलायन से कराहते पहाड़ को यहां की जनना ही पाल रही है। उसके जुझारूपन ने गांवों को जीवित रखा है। पौड़ी के बैंग्वाड़ी गांव को महिलाओं ने ही सहेजा और संवारा है। उनकी सशक्त भागीदारी से गांव का अस्तित्व बचा हुआ है। ग्राम प्रधान से लेकर ग्राम प्रहरी और राशन डीलर तक सब महिलाएं हैं। यहां महिलाओं के चार समूह हैं। दो वन पंचायत और तीन ब्लॉक के। सौ परिवारों के इस गांव में अब सिर्फ  40-45 ही रह गए हैं। बच्चों के पढ़ने की उम्र होते ही लोग गांव छोड़कर चले जाते हैं।
 
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हालांकि कुछ परिवार जिनके बच्चे बड़े हो गए, गांव में वापस भी आए हैं। पुराने घर टूटने पर उन्होंने नये मकानों का निर्माण कराया है। गांव की सभी महिलाएं खेती, गोपालन और मनरेगा में काम करती हैं। बैंग्वाड़ी के वजूद को बचाकर रखने में जनना की अहम भूमिका है। पौड़ी-श्रीनगर रोड पर सात किमी दूर सुंदर स्थान है बैंग्वाड़ी। इन दिनों प्रधानी के चुनाव चल रहे हैं। मधु खुगशाल ऐसी महिला हैं जो सिर्फ नाम की प्रधान नहीं रहीं। पांच साल में प्रधान के सारे दायित्व उन्होंने खुद निभाए। दोबारा भी चुनाव लड़ रही हैं। वह डबल एमए हैं। महिलाओं को संगठित करने का उन्होंने भरपूर प्रयास किया है।
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बताती हैं जनवरी में जय झाली देवी समूह की महिलाओं ने सामूहिक खेती की। चौलाई के लड्डू बनाए। लोन से गाय लीं। अभी सब अपनी-अपनी खेती करती हैं। गांव की महिलाओं का अर्थव्यवस्था में अहम योगदान है। इनकी वजह से ही गांव जीवित है। सभी के यहां गाय हैं। दूध का व्यापार करती हैं। 13-14 मनरेगा में काम करती हैं। दया काला वन विभाग में सरपंच है। विभाग ने 20 हेक्टेयर में वनीकरण किया है। वह उसी की देखरेख करती हैं। उसका सारा काम वही संभालती है।
 

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बताती हैं, अगस्त में ही यह काम शुरू हुआ है। इसके लिए उन्हें 5800 रुपये प्रति माह मिलेंगे। ग्राम प्रहरी अनीता देवी गांव में हुए झगड़ों को सुलझाती हैं। उनकी कोशिश होती है कि पुलिस में मामला न जाए। बीना देवी राशन डीलर हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए सुमन पौड़ी चली गई थीं। उनके बड़ा होने पर 13 साल बाद वापस आईं। बच्चे देहरादून में नौकरी करते हैं। सुमन के पति नहीं हैं। वह वन विभाग में पौधों की देखरेख करती हैं। मनरेगा में भी काम करती हैं।
 
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कर्मठ मुन्नी भी पौड़ी से लौट आईं। बच्चों के लिए वह पौड़ी गई थीं। पति प्राइवेट जॉब करते हैं। यहां आकर घर बनाया। उसमें खुद लेबर का काम किया है। उनकी सास ने बगीचा लगा रखा है। सास-बहू उसी में काम करती हैं। मधु बताती हैं, गांव का रास्ता बनवाया। रेलिंग भी लगवाई। जो लोग बाहर चले गए हैं, वे हमारे साथ व्हाट्सएप ग्रुप पर जुड़े हैं। वे बोलते हैं, इस विकास का क्या फायदा, जब रास्तों पर चलने वाले ही नहीं हैं। मैं उनसे बस यही कहती हूं, जो गांव में बसे हैं, उनका क्या। कुछ लोग लौट भी रहे हैं।
 
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चार-पांच नये घर बने हैं। इस गांव में कई खूबसूरत घर है जिनमें फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। कभी बैंग्वाड़ी में संतरा, नारंगी, सेब आदि की अच्छी फसल होती थी। जंगली जानवरों ने खेती को बहुत नुकसान पहुंचाया है। गांव सड़क से जुड़ा है। यहां से पलायन का मुख्य कारण शिक्षा और स्वास्थ्य हैं। प्राइमरी और जूनियर स्कूल गांव से करीब डेढ़ किमी दूर है। बैंग्वाड़ी का स्कूल मल्ली गांव के बच्चों की वजह से चल रहा है। इस गांव के सिर्फ  पांच-छह बच्चे ही वहां पढ़ते हैं। इलाज के लिए महिलाओं को पौड़ी जाना पड़ता है।
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