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हरिद्वार महाकुंभ  2021 : साढ़े चार साल से उर्द बाहु तपस्या में लीन हैं दिगंबर दिवाकर भारती, तस्वीरें

Wed, 03 Mar 2021 02:40 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
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संत दिगंबर दिवाकर भारती - फोटो : अमर उजाला
महाकुंभ में आए संत दिगंबर दिवाकर भारती साढ़े चार साल से उर्द बाहु (बाएं हाथ) को ऊपर कर तपस्या में लीन हैं। उनका कहना है यह तपस्या आजीवन जारी रहेगी। एसएमजेएन कॉलेज में बनी श्री निरंजनी अखाड़े की अस्थायी छावनी में पहुंचे दिगंबर दिवाकर भारती ने कहा कि उन्होंने हिमालय में अलग-अलग स्थानों पर तपस्या की है। उत्तराखंड के नैनीताल और पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भी तपस्या की है। पिछले एक साल से औरंगाबाद में तपस्या कर रहे हैं। 11 मार्च को होने वाले महाशिवरात्रि के शाही स्नान के लिए वह हरिद्वार पहुंचे हैं। उनका कहना है कि भगवान से लगाव ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्म है। भगवान की इच्छा से ही मनुष्य अपने शरीर पर नियंत्रण रख सकता है। वह पिछले छह साल से फलाहार पर हैं। प्रयागराज कुंभ में भी वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। वहीं कुंभ मेलों की पेशवाइयों और शाही स्नानों के समय साधु संतों के अखाड़ों के ऐश्वर्य दर्शन भी होता रहा है। मुगलकाल और ब्रिटिशकाल में देसी राजा-महाराजा कुंभ के अवसर पर सोने-चांदी, हीरे-मोती का जखीरा साधु-संतों को दान दिया करते थे।

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संत दिगंबर दिवाकर भारती - फोटो : अमर उजाला
सम्राट हर्षवर्धन तो कुंभ और अर्धकुंभ के अवसर पर अपना सर्वस्व संतों को दान कर कुंभ मेले से खाली हाथ लौट जाते थे। अगले छह वर्ष जो संग्रह होता, उसे पर किसी कुंभ नगर में जाकर लुटा देते। अपना कुछ भी नहीं के भाव वाले हर्षवर्धन का अनुसरण बाद में अनेक हिंदू राजाओं ने भी किया।
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संत दिगंबर दिवाकर भारती - फोटो : अमर उजाला
अखाड़ों के नागाओं ने भी कई बार उन राजाओं की सेना के साथ अत्याचारी मुगलों के खिलाफ युद्धों में भाग लिया। इतिहास में वर्णन मिलता है कि नागाओं ने पानीपत के रण में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के साथ महमूद गजनवी के खिलाफ युद्ध लड़ा। बाद में यही राजा-महाराजा संन्यासियों के अखाड़ों को हाथी, घोड़े, रथ, शस्त्र, हीरा माणिक का जखीरा दान में देते थे।

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हरिद्वार कुंभ - फोटो : अमर उजाला
इसी जखीरे के साथ कुंभ के अवसर पर नागाओं की मणियां कुंभ नगर के बाद डेरा डालती थीं। अखाड़ों के मुकामी इन संतों को नगर प्रवेश के साथ प्रवेशवाई अर्थात पेशवाई के रूप में अखाड़े में लाते और धर्मध्वजा उन्हें सौंप देते।
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हरिद्वार कुंभ - फोटो : अमर उजाला
शाही स्नान का नाम ही इसलिए पड़ा, क्योंकि संत तमाम जखीरे के राजसी ठाठ से स्नान को जाते हैं। प्राचीन समय में संतों की पालकी को उठाने वालों के साथ हिंदू नरेश भी कंधा देकर पुण्य अर्जित करते थे। कुंभ मेला संपन्न हो जाने पर यह जखीरा अखाड़ों के गोदामों में सुरक्षित रख दिया जाता है। अगला कुंभ जहां भरता है, कीमती जखीरा वहां भेज दिया जाता है।
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