फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Haridwar Kumbh Mela 2021 : समुद्रमंथन से अमृत ही नहीं विष सहित निकले थे चौदह रत्न

Thu, 28 Jan 2021 12:28 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार
विज्ञापन
1 of 5
हरिद्वार - फोटो : अमर उजाला (File Photo)
देवों और दानवों के बीच काल के सत्यखंड में हुए समुद्र मंथन में मृत्यु का कारक विष और अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत ही नहीं, चौदह बहुमूल्य रत्न भी निकले थे। मंथन से निकले हलाहल का पान भगवान शंकर ने किया और नीलकंठ बन गए। अमृतपान कराते हुए मोहिनी रूपधारी विष्णु ने असुरों से छल किया। इस छल के परिणामस्वरूप धरती के चार स्थानों पर कुंभ के महापर्व पड़े। दुर्वासा ऋषि के शाप से देवता श्रीहीन हो गए और राक्षस उन पर भारी पड़ने लगे।
विज्ञापन

2 of 5
वासुकी नाग
तब विष्णु ने देवताओं को समुद्रमंथन कर अमृत निकालकर अमर होने की सलाह दी। अशक्त देवता अकेले समुद्र नहीं मथ सकते थे, अत: उन्होंने असुरों को भी मंथन में शामिल करना पड़ा। मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्रमंथन शुरू हुआ। सबसे पहले विष निकला। कोई उसे लेने को तैयार नहीं हुआ तो देवों की प्रार्थना पर शिव ने उसे पिया और कंठ में रोककर नीलकंठ हो गए। दूसरा रत्न कामधेनु गाय थी, जिसे ब्रह्मनाद करने वाले ऋषियों ने ले लिया।
विज्ञापन

3 of 5
भगवान विष्णु (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
फिर मंथन से सर्वश्रेष्ठ उच्चैश्रवा अश्व निकला जिसे इंद्र ने ले लिया। इसी प्रकार चौथे रत्न के रूप में ऐरावत हाथी निकला, इसे भी इंद्र ले गए। कौस्तुभमणि निकली तो उसे भी विष्णु ने ले लिया। समुद्र से निकले कल्पवृक्ष की स्थापना स्वर्ग में कर दी गई, जबकि अप्सरा स्वयं ही देवताओं के पास चली गई। अभूतपूर्व संपदा के रूप में लक्ष्मी निकली तो देवों और दानवों दोनों ने उन्हें लेना चाहा। विवाद टालने के लिए लक्ष्मी का धारण विष्णु ने कर लिया। समुद्र से सुरा रूपिणी मदिरा निकली तो दैत्यों ने उसे ले लिया।

4 of 5
समुद्रमंथन - फोटो : अमर उजाला (file photo)
समुद्र से निकले चंद्रमा भगवान शिव, पारिजात वृक्ष देवताओं, पाञ्चजन्य शंख विष्णु और 13वें रत्न के रूप में निकले धन्वंतरि स्वर्ग के हिस्से आए। अंत में चौदहवें रत्न अमृत के निकलने पर उसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों में संघर्ष होने लगा। तब विष्णु ने मोहिनी रूप धारणकर देवताओं और राक्षसों को पंक्ति में बैठाया। विष्णु छलपूर्वक देवताओं को अमृत पिलाने लगे और देवताओं को अपने मोहिनी रूप के आकर्षण में डुबाने लगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
राहु
तब राहु नामक दैत्य ने विष्णु का षड्यंत्र भांप लिया और वह देवता रूप धारणकर देवों की कतार में बैठकर अमृत पीने में सफल हो गया। तभी विष्णु उसे पहचान गए और उसका सिर काट डाला। गरुड़ अमृत कलश लेकर भागे। सूर्य और चंद्रमा ने राहु केतु से उनकी रक्षा की। विश्राम के लिए गरुड़ ने आठ स्थानों पर स्वर्ग में और चार स्थानों पर धरती पर कलश रखा। सभी जगह अमृत छलका जो कुंभ महापर्वों के आयोजन का कारण बना।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें