शनिवार को बस्तड़ी में हर आंख नम थी और हर दिल रो रहा था। गांव से एक साथ नौ अर्थियां उठीं। उस दिल के कराह की आखिर क्या सीमा होगी, जो अंतिम दर्शन के लिए अर्थी की ओर बढ़े, लेकिन किसी ‘अपने’ के शव के अंतिम दर्शन की बजाय उसके पुतले की अर्थी की परिक्रमा कर खुद को दिलासा देने की कोशिश करे।
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Effigies burn in bastari
- फोटो : अमरउजाला
30 जून को बादल फटने से मची तबाही के बाद शनिवार को बस्तड़ी में यही हुआ। तबाही में खो गए नौ लोगों के पुतलों का अंतिम संस्कार चर्मा घाट पर हुआ। घाट पर शनिवार को एक साथ छह चिताएं जलीं और तीन नाबालिग के पुतलों को मिट्टी में दफनाया गया।
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बस्तड़ी में खोजबीन करते जवान
- फोटो : अमरउजाला
30 जून की रात आपदा के समय लापता हुए नौ लोगों की खोजबीन की सारी कोशिश नाकाम होने के बाद गांव के लोगों ने तय किया कि अब सभी लापता लोगों के पुतले बनाए जाएं और उनका अंतिम संस्कार किया जाए।
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बस्तड़ी गांव में मलबे में लापता लोगों को तलाशते जवान
- फोटो : अमरउजाला
हिंदू रीति के अनुसार हर मृतक का अंतिम संस्कार और क्रियाकर्म किया जाना जरूरी होता है। नौ दिन के बाद क्रियाकर्म संभव नहीं होता, लिहाजा शनिवार को बस्तड़ी आपदा की मार और परंपरा निभाने के बीच में एक बार फिर से आपदा का दंश झेलने को मजबूर हो गई।
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Effigies burn in bastari
- फोटो : अमरउजाला
शनिवार सुबह जब लापता नौ लोगों के पुतले तैयार किए गए तो ऐसा लगा कि जैसे गांव में नई आपदा आ गई हो। इस मलबे में अब जिंदगी के निशान तलाशना संभव नहीं रह गया है। पुतले कांस (कुश) घास के बनाए गए।
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Effigies burn in bastari
- फोटो : अमरउजाला
सभी पुतलों को लाल कपड़े में लपेटा गया। उनकी अर्थी बनाई गई। उसके बाद सभी पुतलों को चर्मा घाट तक ले जाया गया। वहां पर छह वयस्क लोगों के पुतलों की तो सामूहिक रूप से चिता जली और तीन नाबालिगों के पुतलों को दफना दिया गया। पुतले तैयार करने का काम सिंघाली में राहत कैंपों में ही किया गया।
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Effigies burn in bastari
- फोटो : अमरउजाला
वहां से लोग इन पुतलों को चर्मा घाट ले गए। धर्म और नियम की इस बाध्यता ने लोगों को एक बार फिर से झकझोर कर रख दिया। अब जब प्रतीकात्मक रूप से अंत्येष्टि के बाद क्रियाकर्म होने लगा है तो किसी के जिंदा वापस आने की उम्मीद लोग पूरी तरह छोड़ चुके हैं।
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bastari village
- फोटो : अमरउजाला
वहां से लोग इन पुतलों को चर्मा घाट ले गए। धर्म और नियम की इस बाध्यता ने लोगों को एक बार फिर से झकझोर कर रख दिया। अब जब प्रतीकात्मक रूप से अंत्येष्टि के बाद क्रियाकर्म होने लगा है तो किसी के जिंदा वापस आने की उम्मीद लोग पूरी तरह छोड़ चुके हैं।
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Effigies burn in bastari
- फोटो : अमरउजाला
अब मलबे से किसी के जीवित बचे होने की संभावना नहीं है। शनिवार को घटना को नौ दिन हो गए हैं। तीन दिन तक इन लापता लोगों के परिजन क्रियाकर्म करेंगे और आत्मा की शांति की प्रार्थना करेंगे।
-पंडित शंकर दत्त भट्ट
जिन लापता लोगों के पुतलों की चिता जली, उनमें माया दत्त (40) पुत्र मुरलीधर, कृष्णानंद (36) पुत्र डिगरदेव, जीवन चंद्र (61) पुत्र चंद्रबल्लभ, गिरीश चंद्र (27) पुत्र रामदत्त, रमा देवी (80) पत्नी हरीदत्त और सरस्वती देवी (60) पुत्री हरी दत्त शामिल थे, जिन नाबालिगों के पुतलों को दफनाया गया, उनमें खुशी (10) पुत्री कृष्णानंद, आर्यन (8) पुत्र कृष्णानंद, गौरव (16) पुत्र मोहन चंद्र शामिल थे।