बचपन से ही आईपीएस बनने का सपना देखने वाली देहरादून की शरमीन की उम्मीदों का चिराग और रोशन हो गया है। अतुल माहेश्वरी छात्रवृत्ति परीक्षा पास कर स्कॉलरशिप हासिल करने वाली शरमीन परवीन के हौसले बुलंद हैं। परिवार में खुशी का माहौल है। पिता भले ही मजदूरी करते हों, लेकिन परिवार का शिक्षा के प्रति रुझान मिसाल से कम नहीं है।
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पढ़ाई के लिए मजदूर पिता के जुनून ने बेटी को दिलाया मुकाम
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देहरादून के लक्खीबाग के एक छोटे से घर में शमीम अहमद का परिवार रहता है। उनके तीन बेटियां और एक बेटा है। खुद मजदूरी करते हैं, लेकिन चारों बच्चों को बराबर की शिक्षा दिला रहे हैं।
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पढ़ाई के लिए मजदूर पिता के जुनून ने बेटी को दिलाया मुकाम
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सबसे बड़ी बेटी शरीन और दूसरे नंबर की बेटी शरमीन कक्षा 10 में पढ़ रही हैं। तीसरे नंबर की बेटी शानिया और सबसे छोटा बेटा शोहराब भी पढ़ रहे हैं। शरीन और शरमीन ने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए अतुल माहेश्वरी छात्रवृत्ति परीक्षा दी थी। शरमीन का चयन छात्रवृत्ति के लिए हुआ तो परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।
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शरमीन को पढ़ने लिखने की बहुत लगन है। उसने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर बेटी ही बचाएगी अभियान के संबंध में बधाई देने के साथ ही कुछ सुझाव दिए थे। पीएम मोदी ने शरमीन को पत्र भेजकर उन्हें शुभकामनाएं दी थी। पीएम ने पत्र में शरमीन की भावनाओं की तारीफ की थी। शरमीन अब तक विभिन्न प्रतियोगिताओं में 35 अवार्ड हासिल कर चुकी है। शरमीन को बिल्लियां पालने का शौक है। उसने घर में सात बिल्लियां पाली हैं। वह पेंटिंग की भी शौकीन है।
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शरमीन ने कहा कि वह आईपीएस बनना चाहती है। दुनिया को दिखाना चाहती है कि उनके समुदाय में भी बेटियां पढ़कर आगे बढ़ सकती हैं। वह उन सब बेटियों के लिए प्रेरणा बनना चाहती है जोकि दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। शरमीन ने दसवीं में 84 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। उसका मकसद बोर्ड में मेरिट में जगह बनाना है।
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शरमीन की अम्मी शबाना परवीन ने साल 1991 में 10वीं पास की थी। इसके बाद शादी और बच्चों की वजह से पढ़ाई छूट गई। वर्ष 2012 में उन्होंने दोबारा 12वीं की परीक्षा दी और अच्छे अंकों से पास कर ली। अब शबाना एसजीआरआर पीजी कॉलेज में बीए तृतीय वर्ष की रेगुलर स्टूडेंट हैं। सुबह जल्दी उठकर परिवार का नाश्ता बनाने के बाद शबाना बाकी युवाओं की तरह कॉलेज जाती हैं और क्लास अटेंड करती हैं। शबाना ने बताया कि वह चार ऐसे बच्चों को भी पढ़ाती हैं, जोकि मजबूरी में पढ़ाई से दूर थे।