समाज में जरूरतमंदों के चेहरों पर मुस्कान लाना ही सेंटा क्लॉज का मकसद था। सेंटा क्लॉज लोगों की मदद इस तरह करते थे, कि उन्हें पता भी न चले। समाज के दुखी, वंचित और जरूरतमंद लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाना ही सेंटा क्लॉज का असल मकसद था। सेंटा की इसी सोच के कुछ लोग अपने शहर में भी है। जो नि:स्वार्थ भाव से जरूरतमंदों, वंचितों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सेवा में वर्षों से जुटे हैं। ऐसे लोगों के लिए और इस शहर के लिए ये लोग भी सेंटा क्लॉज से कम नहीं।
किसी ने मुश्किल घड़ी में मदद पहुंचाकर जिंदगी बचाई तो किसी ने चेहरे पर मुस्कान लाकर हौसला दिया। सेवा कार्य के दौरान शहर के इन सेंटा क्लॉज के सामने भी कई बाधाएं आई, लेकिन ये पीछे नहीं हटे। और आज भी समाज की सेवा उसी तन्यमता से कर रहे हैं। और लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला रहे हैं। आइये आपको शहर के इन सेंटा क्लॉज से मिलाते हैं।
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मोहित सेठी की मदद ने कई जरूरतमंदों को नई जिंदगी दी है। वह अब तक बीस बार रक्तदान कर चुक है। दिक्कत के कारण जब वे कई बार रक्तदान नहीं कर पाए तो उन्होंने दो हजार लोगों को एक ऐसा ग्रुप बनाया जो जरूरत पड़ने पर कभी भी कही भी लोगों को ब्लड देने पहुंच जाए। इसमें हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून सहित कई जगह के लोग शामिल हैं। पिछले पांच साल से मोहित की इस पहल के कारण केवल दून ही नहीं बल्कि अन्य जिलों में भी जरूरतमदों को ब्लड मिल पा रहा है।
मरीज को ब्लड की जरूरत पड़ी तो बिना देरी किए हरीश गुलाटी दौड़े चले आए। वह कहते हैं कि यह एक ऐसा क्षण होता है जब जरा सी देरी इंसान की जिंदगी छीन सकती है। इसलिए रक्तदान बड़ा पुण्य होता है। अपने साथ ही उन्होंने अपने दोनों बेटों को भी बिना देरी किए ऐसे लोगों की मदद करने का पाठ सिखाया। वह खुद तो कई बार रक्तदान कर चुके हैं, लेकिन उनके बेटे रक्षित और एकांश भी कई बार रक्तदान कर मरीजों को नई जिंदगी दे चुके हैं।