पंचायती गणतंत्र के सपने को जमीन पर उतारने से हिचकिचाहट, आज भी राज्यों के पंचायतीराज अधिनियम में साफ दिखाई दे रही है
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- एक सपना आसमानी से जमीनी होते जाने का
गौर करें कि संसदीय गणतंत्र, एक छतरी की तरह हो गया है। समय-समय पर आने वाली बरखा रूपी जनाकांक्षा की बूंदें, जिसके धारक प्रतिनिधियों को स्पर्श करती भी हों, तो भिगो नहीं रही। सिर्फ इतना नहीं, बल्कि धारक प्रतिनिधि इस बात के लिए ज्यादा सतर्क रहने लगे हैं कि वे किसी भी तरह भीगने न पाएं। हम, भारत विविध भूगोल, संस्कृति व जीवन शैलियों का देश हैं। एकसमान योजना-परियोजना-तौर-तरीका-तक़नीक को सभी पर लागू करना; सभी के लिए हितकरी सिद्ध हो; भारत में यह जरूरी नहीं।
अतः भारत को एक ऐसे विशाल हृदया निर्मल तालाब की प्रकृति का गणतंत्र होने की ज़रूरत हो; जिसमें दूर-दूर से आये जल रूपी विविध विचार और समृद्धि प्रयास समा सके; कई रंग के कमल, मछलियां और अन्य जीव-जन्तु न सिर्फ आवास पा सकें, बल्कि उसकी सुन्दरता व गतिविधियों में योगदान दें।
संभवतः इसीलिए राष्ट्रपिता गांधी ने भारत को संवैधानिक तौर पर संसदीय की बजाए, पंचायती गणतंत्र बनाने का दस्तावेज संविधान सभा को सौंपा था। पंचायतीराज विधेयक को संसद में पेश करते वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भारत के लोगों को अधिकतम लोकतंत्र, अधिकतम सत्ता सुपुर्द कर, सत्ता के दलालों का खात्मा करने की मंशा इभी इसीलिए ज़ाहिर की थी।
उन्होने याद दिलाया था - ''जब हम पंचायतों को वही दर्जा देंगे, जो संसद और विधानसभाओं को प्राप्त है; तो हम लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए दरवाजे़ खोल देंगे।... सत्ता के दलालों ने इस तंत्र पर कब्जा कर लिया है। सत्ता के दलालों के हित में इस तंत्र का संचालन हो रहा है।...सत्ता के दलालों के नाशपाश को तोड़ने का एक ही तरीका है और वह यह है जो जगह उन्होंंने घेर रखी है, उसे लोकतंत्र की प्रक्रियाओं द्वारा भरा जाए।...
सत्ता के गलियारों से सत्ता के दलालों को निकाल कर, पंचायतें जनता को सौंपकर, हम जनता के प्रतिनिधियों पर और जिम्मेदारी डाल रहे हैं कि वे सबसे पहले उन लोगों की तरफ ध्यान दें, जो सबसे करीब हैं; सबसे वंचित हैं; सबसे ज़रूरतमंद हैं। हमें जनता में भरोसा है। जनता को ही अपनी किस्मत तय करनी है।''
73वें-74वें संविधान संशोधन ने पारित होकर दर्जा भी दिया और जिम्मेदारी भी डाली। मोदी सरकार द्वारा शुरु 'ग्राम पंचायत विकास योजना' ने भी एक खिड़की खोली है। संसदीय मतलब आसमानी, पंचायती मतलब ज़मीनी गणतंत्र; किंतु हम, भारत के नागरिक आज भी यह फर्क हासिल करने को प्रेरित नहीं दिखाई दे रहे। हम, आज भी आसमानी गणतांत्रिक व्यवस्था की ओर ही ताक रहे हैं। हमें हर जरूरत की पूर्ति के लिए सरकार के समक्ष मांग का कटोरा लेकर ताकने की आदत जो डाल दी गई है।
पंचायती गणतंत्र के सपने को जमीन पर उतारने से हिचकिचाहट, आज भी राज्यों के पंचायतीराज अधिनियम में साफ दिखाई दे रही है। एक ओर तारीख-पे-तारीख के खेल में खिंचते मुक़दमों से हैरान-परेशान अवाम; दूसरी ओर अनेक ने न्याय पंचायती व्यवस्था को लागू नहीं किया; एक प्रदेश की विधायिका ने लागू को ही मिटा दिया! सत्ता पाकर गांव का प्रधान, पंच और ग्रामसभा में बंट जाना। इस सत्ता-चरित्र से उबरे बगैर पंचायती गणतंत्रता की ओर बढ़ना असंभव है और आर्थिक साम्राज्यवाद के खतरों से अंतिम जन को बचाना भी।
- पंचायती मतलब न सत्ता, न प्रजा
गौर करें कि यहां पंचायती का मतलब यह नहीं कि प्रभाव तो गांव में होना है; सोचने, योजना बनाने और क्रियान्वयन के तरीके कहीं और...केन्द्र में तय हों। इस पर भी घोषणा और अपेक्षा की लोगों को सहभागी बनाना है। यह तो सिद्धांततः उलट बात है। यही तो हमारे संसदीय गणतंत्र में कमी है। हमें एकमत होना होगा कि पंचायती का मतलब, केन्द्र से सोची और उतारी गई योजनाओं को क्रियान्वित करने वाली एजेन्सी हो जाना नहीं है। पंचायती मतलब सत्ता का प्रधान-पंच के हाथ में आ जाना भी नहीं। आइए, हम इससे आगे सोचें। अतीत में झांकें।
पंचायती का मतलब परंपरागत पंचायती; जहां कोई सत्ता नहीं, कोई प्रजा नहीं। कार्य विशेष के लिए बैठी सभा, कार्य सम्पन्न होने के साथ ही विसर्जित हो गई। गांव की आय में किसका कितना अंश... गांव के पुरोहित-कारीगर का कितना; व्यवस्था संचालकों को कितना ? सब कुछ परंपरा से तय था। अंश प्राप्तकर्ता को मांगने नहीं आना पड़ता था। अंश को एकत्र करना; उसके प्राप्तकर्ता तक पहुंचाना भी गांव द्वारा तय ग्रामणी का काम। नेतृत्व से लेकर निर्णय तक सभी कुछ सामिलात, सर्वसम्मत्, सम्भावी, स्वावलंबी, न्यायप्रिय।
पंचायती लोकतंत्र का मतलब, अपने बारे में खुद सोचने, खुद नियोजित करने और खुद ही उसका क्रियान्वयन करने वाली व्यवस्था। क्रियान्वयन करने वाले हाथ, जवाबदेही, संसाधन भी उसी स्थान के हों, जिस भूगोल पर उसका सीधे-सीधे प्रभाव होना है; चाहे फिर वह गांव हो या नगर। यही तो असली आजादी थी; असली स्वराज।
आखिरकार, यही तो वह व्यवस्था थी, जिसे भारत की सुख, समृद्धि और स्वतंत्रता का अधिकतर श्रेय देते हुए ब्रिटिश गर्वनर चाल्र्स मेटकाफ ने लिखा था - ''ये गांव समाज छोटे-छोटे ऐसे प्रजातंत्र हैं, जिन्हे अपनी आवश्यकता की लगभग हर वस्तु अपने ही भीतर मिल जाती है; जो विदेशी संबंधों से लगभग स्वतंत्र होते हैं। ये ऐसी परिस्थितियों में भी टिके रहते हैं, जिनमें दूसरी हर वस्तु का अस्तित्व मिट जाता है।''
क्या हम ऐसे स्वावलंबी-स्वराजी लोकतांत्रिक गणतंत्र बनाने की दिशा में अग्रसर हों ? एक गणतंत्र के रूप में भारत सात दशक पूरा करना जा रहा है। आइए, 72वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम, भारत की जनता इस पर विचार करें।
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