बीजेपी आज 42 साल की हो गई। 6 अप्रैल 1980 को जब ये पौधा रोपा गया था, तो लगा नहीं था कि अपने शुरुआती स्वरूप जनसंघ से भी कई गुना बड़ा पेड़ लगेगा। इतना बड़ा कि बाकी पेड़ इसके आगे बौने या पौधे लगेंगे। ऐसे में 2 सांसदों की पार्टी से लेकर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनने तक की इस यात्रा में ये 42 बातें आपको बीजेपी के संगठन, इतिहास, विचारों, रणनीति और उसके नेताओं के बारे में समझने में मदद करेंगी।
1- बीजेपी के नेता हमेशा कहते हैं कि वो संघ परिवार का हिस्सा हैं, लेकिन कैसे हैं, ये आम आदमी को नहीं पता होता। उनका संघ यानी RSS से ये जुड़ाव किस तरह से होता है। आज इसको समझिए। RSS से जुड़े सभी संगठनों में संगठन मंत्री नाम का पद बड़ा महत्वपूर्ण होता है, जो प्रचारकों और विस्तारकों को मिलता है। ये वो लोग होते हैं, जो सारी जिंदगी बिना शादी किए, या कुछ साल के लिए घर छोड़कर केवल संघ या उससे जुड़े संगठनों के विस्तार और प्रचार के लिए काम करते हैं, जैसे बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री राम लाल पहले संघ में क्षेत्र प्रचारक के पद पर रह चुके हैं और अब फिर से संघ में ही केन्द्रीय टोली में फिर से लौट गए हैं।
ऐसे ही प्रदेश संगठन मंत्री या प्रदेश संगठन महामंत्री चाहे वो हरियाणा के रविन्द्र राजू हों, यूपी के सुनील बंसल हों, एमपी के हितानंद शर्मा हों, ये सभी संघ प्रचारक हैं। जो संघ या उसके किसी और संगठन से जैसे विद्यार्थी परिषद या मजदूर संघ से जुड़े रहे हैं। बाद में उन्हें बीजेपी में भेजा गया। ये लोग बीजेपी और संघ में समन्वय का काम करते हैं।
2—संघ की तरफ से बीजेपी से आधिकारिक रूप से समन्वय का काम कभी मदनदास देवी जैसे वरिष्ठ प्रचारक देखते रहे हैं, सुरेश सोनी और डॉ. कृष्ण गोपाल ने भी देखा और अब अरुण कुमार देख रहे हैं और संघ की केन्द्रीय टोली में सह सर कार्यवाह के पद पर हैं।
3—आमतौर पर ये माना जाता रहा है कि जो प्रचारक बीजेपी में काम कर लेते हैं। उनको संघ की कोर टीम में वापस ना लेने का अघोषित सा नियम रहा है, जो अब टूट रहा है। हाल ही में बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री पद से संघ में वापस लौटे राम लाल को संघ के सह सम्पर्क प्रमुख के पद पर वापस लिया गया, पिछले साल उन्हें अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख बना दिया गया।
4— मीडिया में कहा जाता है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI की तरह बीजेपी का छात्र संगठन है, वो तथ्यात्मक रूप से बिलकुल गलत है। दोनों संगठन भले ही संघ परिवार का हिस्सा हों, लेकिन जिस तरह एनएसयूआई में जिले या नगर में पदाधिकारियों की नियुक्ति जिले या नगर के कांग्रेस अध्यक्ष करते हैं और राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नियुक्ति अब तक सोनिया या राहुल गांधी करते आए हैं, वैसे अधिकार बीजेपी के ना तो जिला अध्यक्ष को है और ना ही राष्ट्रीय अध्यक्ष को। ABVP का अपना अलग संगठन है, जिसमें आमतौर पर नगर, प्रदेश या राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर कोई अध्यापक या प्रोफेसर होता है।
एबीवीपी वैसे भी संघ ने तब खड़ा किया था, जब ना जनसंघ बना था और ना बीजेपी, 1949 में इस संगठन की नींव पड़ी थी और आज बीजेपी में सबसे टॉप के नेता इसी संगठन ने दिए हैं। चाहे वो अमित शाह और जेटली जैसे नेता हों या फिर सुनील बंसल जैसे संगठन मंत्री।
5—बीजेपी के अपने कई प्रकोष्ठ हैं, लेकिन कोई छात्र संगठन नहीं। बीजेपी का सबसे बड़ा सहयोगी संगठन है भारतीय जनता युवा मोर्चा यानी BJYM। अनुराग ठाकुर के बाद इस पद पर पूनम महाजन की नियुक्ति हुई थी, अब तेजस्वी सूर्या इसके अध्यक्ष हैं। महिला मोर्चा भी अब मजबूत हो चला है।
बीजेपी का अपना कोई छात्र संगठन नहीं है, एक बार शुरू करने की बात भी हुई थी, लेकिन एबीवीपी से टकराव के चलते वो आइडिया टाल दिया गया। आमतौर पर संघ के कई संगठन जैसे विश्व हिंदू परिषद, एबीवीपी, किसान संघ, मजदूर संघ, बजरंग दल आदि बीजेपी के मुद्दों को समर्थन भी करते हैं और मौके बेमौके विरोध भी। इसलिए अक्सर बिना संघ प्रष्ठभूमि के बीजेपी में आने वाले नेता इस गोरखधंधे को समझ नहीं पाते।
6—संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कई अनौपचारिक बातचीत में ये माना है कि संघ का इरादा अपनी कोई राजनीतिक इकाई खोलने का था ही नहीं। सावरकर की हिंदू महासभा से भी संघ का कोई आधिकारिक जुड़ाव नहीं था। 1925 में शुरू हुए RSS ने ABVP जैसे तमाम संगठन 1950 तक खड़े कर दिए थे, लेकिन राजनीतिक पार्टी को लेकर कभी आम सहमति नहीं बन पाई थी। ऐसे में महात्मा गांधी की हत्या ने काफी कुछ बदल दिया।
हिंदू महासभा से वीर सावरकर जुड़े थे, उनसे नाथूराम गौडसे के रिश्तों को लेकर उन पर गांधी हत्या का केस चलाया गया। संघ को भी बैन कर दिया गया। बाद में सावरकर भी बरी हो गए, संघ पर से भी बैन हट गया। लेकिन इन तीन चार सालों में संघ के कार्यकर्ताओं को पुलिस और जांच एजेंसियों ने इतना परेशान किया कि उनको लगने लगा कि राजनीतिक पार्टी हो ना हो, लेकिन ऐसा कोई संगठन राजनीति में जरूरी है, जो संघ के प्रति मित्रभाव रखता हो।
जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने गांधी हत्या के बाद हिंदू महासभा से इस्तीफा दे दिया तो उन्होंने संघ के सहयोग से बीजेएस यानी भारतीय जनसंघ की स्थापना की, तारीख थी 21 अक्तूबर 1951। यानी पहले आम चुनाव से ठीक पहले। उस चुनाव में जनसंघ को तीन सीटें मिली थीं।
7— जो लोग नहीं जानते हैं, वो जान लें कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी इससे पहले हिंदू महासभा के 1943 से 1946 तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे थे, धारा 370 का उन्होंने जमकर विरोध किया था। कश्मीर में घुसने के लिए भारतीयों को पहले परमिट लेना पड़ता था, मुखर्जी ने जमकर विरोध किया, नारा दिया- ‘एक देश में दो निशान, दो विधान, दो प्रधान नहीं चलेंगे’। दो साल के अंदर ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर की जेल में मौत हो गई तो उपाध्यक्ष चंद्रमौली शर्मा को अध्यक्ष बनाया गया। उनके बाद प्रेमचंद्र डोगरा, आचार्य डीपी घोष, पीताम्बर दास, ए रामाराव, रघु वीरा, बच्छरास व्यास आदि जनसंघ की कमान संभालते रहे, 1966 में बलराज मधोक ने संभाला और 1967 में अध्यक्ष बने दीनदयाल उपाध्याय। उनके बाद अगले चार साल यानी 1972 तक अटल बिहारी बाजपेयी रहे और 1977 तक लाल कृष्ण आडवानी।