मजदूरों के अधिकार को लेकर संघर्ष
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आज जब दुनिया में कृत्रिम बौद्धिकता, रोबेटिक टेक्नोलॉजी, थ्री डी-इंटरनेट ऑफ द थिंग्स के जरिए तीसरी औद्योगिक क्रांति के शुरुआत का दावा किया जा रहा है। ऐसे में एक ओर जहां बेरोजगारी-गैर बराबरी के और बढ़ने की संभावना है, वहीं मनुष्य के प्रभुत्व को लेकर भी आशंका व्यक्त किया जाने लगा है।
जैकबस्टिन जैसे विचारकों ने दावा किया है कि, कृत्रिम बौद्धिकता सन् 2020 के बाद इन्सानी बौद्धिकता से आगे निकल जाएगी। पर असल सवाल यह कि कृत्रिम मशीन वाला समाज कैसा होगा? दावा यह भी किया जा रहा है कि, कृत्रिम बौद्धिकता से बेरोजगारी बढ़ेगी, पर यह गरीबी के हद तक नहीं होगी। उम्मीद है कि भविष्य में मशीन और मनुष्य मिलकर काम करेंगे।
डॉ भीमराव आंबेडकर की बड़ी भूमिका
भारत में मजदूर आंदोलन को नया तेवर और कलेवर देने में ट्रेड यूनियनों के अलावा डॉ भीमराव आंबेडकर की बड़ी भूमिका रही है। भीमराव आंबेडकर ने 15 अगस्त 1936 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना किया। उसके बैनर तले एक बड़े मजदूर आंदोलन का नेतृत्व किया।
मजदूरों का आह्वान किया कि मजदूर अपने अधिक से अधिक प्रतिनिधियों चुनकर मौजूदा लेजिस्लेटिव कॉउंसिल पर कब्जा करें।
डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की मान्यता है कि,अपने हक के लिए मजदूरों का हड़ताल करना अथवा हड़ताल में शामिल होना सिविल अपराध है। फौजदारी गुनाह नहीं।
सन् 1937 में भीमराव आंबेडकर ने महारों को अधीनता में रखने वाले कानून 'वतन प्रथा' के विरोध में विधेयक पेश किया। यह एक ऐसी प्रथा थी, जिसके तहत थोड़ी सी जमीन के बदले पूरे गांव के महारों को बेगारी करने के लिए विवश होना पड़ता था। पूरा गांव एक तरह से बधुआ मजदूर हो जाता था। इस प्रथा को सन् 1918 में सबसे पहले कोल्हापुर राज्य में साहू जी महाराज ने खत्म किया।
डॉ भीमराव आंबेडकर आर्थिक शोषण पर आधारित पूंजीवाद और सामाजिक शोषण पर आधारित ब्राह्मणवाद के घोर विरोधी थे। सन् 1938 में मनमाड़ अस्पृश्य रेलवे कामगार परिषद की अध्यक्षता करते हुए भीमराव आंबेडकर ने दावा किया कि, भारतीय मजदूर वर्ग ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों का शिकार हैं। इन दोनों व्यवस्थाओं पर एक ही सामाजिक समूह का वर्चस्व है।
कहना होगा कि पूंजीवाद के तहत फलने-फूलने वाली निजीकरण की अर्थव्यवस्था कितनी बेरहम होती है। उसकी बानगी कोरोना जैसे महामारी के वक्त दिखा।जब पुरी दुनिया जिंदगी का पहिया ठप पड़ गया था। चारों ओर त्राहिमाम मचा था, उस स्याह समय में भी फार्मास्युटिकल और डिजिटल कंपनियों ने बेशुमार मुनाफा कमाया।
कोरोना काल से थोड़ी राहत मिली थी कि रूस-यूक्रेन के बीच जारी जंग ने रही सही कसर पूरा कर दी। युद्ध के असर और कच्चे तेल की आपूर्ति में पैदा हो रही है बाधा की वजह से महंगाई आसमान छू रही हैं। श्रीलंका,पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में अन्न का संकट पैदा हो गया है। भारत के कोर सेक्टर के उत्पादन में भी गिरावट दर्ज हुई है।
सेंटर फ़ॉर मोनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की हालिया रिपोर्ट में बताया गया बेरोजगारी की दर 8.1% तक पहुँच चुकी है। ऐसी विकट स्थिति में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि कुछ राज्य सरकारों द्वारा फैक्टरी कानून में संशोधन और श्रम कानूनों को स्थगित करने के बजाय मजदूरों के वाजिब अधिकारों को सुरक्षित और संरक्षित करने के उपाय किया जाए। आज के समय में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस इस मायने में ज्यादा प्रासंगिक और उपादेय है।
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