122 साल की महिला को मिला सबसे बड़ा दर्द, कुछ दिन पहले ही मनाई थी 100वीं सालगिरह, तस्वीरों में देखिए मामला।
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वूमेन्स डे, सबसे बुजुर्ग दंपति
बात काफी हैरान करने वाली है, शायद यकीं ही नहीं कर पाए कोई, लेकिन सच है। पंजाब में बठिंडा जिले के गांव हररंगपुरा निवासी 120 वर्षीय भगवान सिंह की सोमवार सुबह मौत हो गई। बता दें कि 18 फरवरी को दोनों की शादी की 100वीं सालगिरह थी, लेकिन वो आखिरी होगी सोचा न था।
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जैसे ही प्रदेश में 120 साल के भगवान सिंह की मौत की खबर फैली, लोग अंतिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़े। हर कोई अर्थी को कंधा देना चाहता था। घरवालों ने भी अंतिम विदाई को यादगार बनाने की कोशिश की। हालांकि दोनों की उम्र का कोई प्रमाण नहीं था, लेकिन आजादी से काफी पहले दोनों का जन्म हुआ और शादी भी। अकसर आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे।
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भगवान सिंह और धन कौर की 5 बेटियां और एक बेटा है। सबसे बड़ी बेटी 90 साल की है, जबकि सबसे छोटा बेटा 55 साल का है। बेटे नत्था सिंह बताते हैं कि जानकारी न होने की वजह से वे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज नहीं करवा सके। लेकिन मेरे पिता सारी जिंदगी नशे से दूर रहे और सादा जीवन जीते रहे। 100 साल की उम्र तक तो उन्होंने खेतों में काम किया।
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नत्था सिंह ने बताया कि आजकल भगवान सिंह बोल नहीं पाते थे। जबकि अंतिम संस्कार में पहुंचे 90 साल के चंद सिंह ने बताया कि दो दिन पहले ही वह उनसे मिलने आए थे, तब बिल्कुल ठीक थे। वह गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी थे और अपनी उम्र में उनकी आवाज में भी काफी दम था। इस समय परिवार में 12 लोग हैं। बेटे नत्था सिंह का परिवार है, जिसकी पत्नी, दो बेटे, दो पुत्रवधू व 4 पोते पोतियां हैं।
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नत्था सिंह ने बताया कि रविवार रात को पिता भगवान सिंह रात को खाना खाकर सोए थे। सवेरे जगाने गया तो वे जा चुके थे। हालांकि उसी समय मां धन कौर को नहीं बताया गया, लेकिन जैसे ही लोग आने-जाने लगे, वे खुद ही समझ गईं।
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बता दें कि 120 वर्षीय भगवान सिंह और करीब 122 वर्षीय ही धन कौर के ज्योना मरना का समागम 4 फरवरी को किया गया। इसमें परिवार के सभी रिश्तेदारों समेत करीब एक हजार लोग एकत्र हुए। उन्होंने बुजुर्ग दंपति को नोटों के हार पहनाए और शगुन भी दिए। भगवान सिंह के पोते नच्छतर सिंह ने बताया कि उसकी पांच बुआ हैं। उनमें से सबसे बड़ी बुआ 92 साल की है और वह भी अपने परिवार समेत रह रही हैं।
पोते नछतर सिंह ने बताया कि एक दिन दादा-दादी ने उसके पिता को कहा था कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी को बहुत अच्छे से जीया और पूरा आनंद माना है अब उनको जीने की और इच्छा नहीं है। अगर हो सके तो उन दोनों के ज्योना मरना का समागम करवा लो। इसके तहत उनके पिता व अन्य परिवार वालों ने उक्त समागम का आयोजन किया था। ताकि दोनों बुजुर्गों को बताया जा सके कि उनके मरने के बाद परिवार किस तरह की रस्में अदा करने वाला था।