एक सरकारी स्कूल के टीचर ने शानदार अविष्कार किया है। घर में वॉशिंग मशीन रखने का सपना अब हर गरीब का पूरा हो जाएगा। मशीन इतनी सस्ती है कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के होश उड़ जाएंगे। आइए जानते हैं इस नई वॉशिंग मशीन के बारे में...
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हरियाणा के सिरसा में साइकिल के जरिए वॉशिंग मशीन का निर्माण किया गया है। अब साइकिल का इस्तेमाल कपड़े धोने की मशीन के लिए भी किया जा सकता है। गांव ममेरां कलां में स्थित राजकीय उच्च विद्यालय में बतौर टीजीटी साइंस अध्यापक नियुक्त राययिंह ने करीब 1600 रुपए के खर्च व 15 दिन की मेहनत के बाद अध्यापक ने इस मॉडल का प्रारूप तैयार कर दिया। अध्यापक के इस कार्य की स्कूल स्टाफ के अलावा अन्य स्कूलों के अध्यापकों ने भी काफी सराहना की है। यही नहीं स्कूल में बनी साइंस लैब में छोटे-छोटे बच्चों को वे विज्ञान की वो बारीकियां सिखा रहे हैं।
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ममेरां कलां स्कूल में नियुक्त साइंस टीचर रायसिंह ने शुरू में रेन वाटर का मॉडल बनाया था। जिसे काफी सराहा गया था। धान के सीजन में उन्होंने पराली के समाधान के लिए एक मॉडल बनाया था, लेकिन उसे उम्मीद के मुताबिक नंबर नहीं मिल पाए। हाल ही में उन्होंने वॉशिंग मशीन का एक मॉडल तैयार किया है। इस मॉडल में साइकिल व एक प्लास्टिक की टंकी का इस्तेमाल किया गया है। ये मॉडल हूबहू वाशिंग मशीन की तरह ही कपड़ों की धुलाई करता है। प्लास्टिक के डिब्बे के आर-पार सुराग कर उसमें एक लोहे का मोटा सरिया फिट किया गया है।
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डिब्बे में लोहे की पतले सरियों से गोलाकार घेरा बनाकर उस पर धागे बांधे गए हैं। ताकि कपड़े अंदर फटे ना। डिब्बे की बाहर की ओर निकाले गए लोहे के सरिए पर एक लोहे का यंत्र लगाकर साइकिल की चेन के साथ अटैच किया गया है। साइकिल का पेडल घुमाने के साथ ही डिब्बे में लगाया गया लोहे के सरियों का जाल घूमने लगेगा। डिब्बे में पानी व सर्फ डालने के बाद यंत्र को घुमाने पर अपने आप झाग बनेंगे और फिर उसमें कपड़े डालने पर वाशिंग मशीन की तरह ही कपड़ों की धुलाई होगी। वहीं दूसरी ओर वर्तमान में सफाई व्यवस्था व सीवरेज ब्लॉक की समस्या को लेकर भी उन्होंने एक सिस्टम तैयार करने का प्लान बनाया है।
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उन्होंने कहा कि जैसे गेहूं काटने के लिए रीपर का इस्तेमाल किया जाता है। रीपर गेहूं को काटकर एक साइड में डाल देती है। इसी प्रकार एक ऐसी मशीन इजाद की जाए। जिसके आगे या पीछे की ओर से तीन-चार झाड़ू लगाकर आगे सफाई होती रहे। मशीन कचरा एक साइड से निकालकर चेन सिस्टम से डस्टबिन में डालती जाए। जिससे की समय के साथ-साथ पैसे की भी बचत होगी। दूसरा रोजाना ब्लॉक रहने वाले सीवरेज को लेकर भी एक प्लान बना रहे हैं। जिससे लोगों को सीवर बंद होने की समस्या से निजात मिलेगी।
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ये रहा है कार्यकाल
वर्ष 2004 में ऐलनाबाद निवासी रायसिंह शुरू में जेबीटी अध्यापक के पद पर नियुक्त हुए थे। इसके बाद वर्ष 2016 में टीजीटी साइंस टीचर के रूप में नियुक्ति मिली। बैनीवाला ने बताया कि उनकी शुरू से ही साइंस में रुचि थी। वे हमेशा ही कुछ न कुछ नया करने को उत्सुक रहते थे। उन्होंने ममेरांकलां स्कूल में साइंस अध्यापन का कार्य शुरू किया।
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- फोटो : Getty Images
स्कूल में टीचरों की बेहद कमी है। लेकिन इसके बावजूद स्कूल में नियुक्त टीचर पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी का निर्वहन कर बच्चों को बेहतर शिक्षा मुहैया करवाने में जुटे हुए हैं। खासतौर पर साइंस टीचर रायसिंह नित नए प्रयोग कर अपने साथ विद्यार्थियों का भी ज्ञान बढ़ा रहे हैं। वे स्वयं गणित के टीचर हैं और स्कूल का इंचार्ज होने के साथ-साथ तीन अन्य स्कूलों की भी उनके पास डीडी पावर है। इसके बावजूद भी वे अपनी ड्यूटी बेहतर तरीके से निभा रहे हैं। -जगदेव सिंह, स्कूल इंचार्ज, गांव ममेरां कलां।
ममेराकलां स्कूल में बतौर टीजीटी साइंस टीचर नियुक्त रायसिंह स्वयं के साथ-साथ बच्चों को विज्ञान की बारीकियों से बेहतर तरीके से अवगत करवा रहे हैं। विद्यार्थी भी उनकी मेहनत को देखते हुए काफी रूचि दिखा रहे हैं। उनके द्वारा हाल ही में बनाया गया वाशिंग मशीन का मॉडल एक उदाहरण है। दूसरे अध्यापकों को भी इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। डॉ. मुकेश कुमार, जिला विज्ञान अधिकारी