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खेतीबाड़ी छोड़ शुरु किया कुछ ऐसा काम, 500 रुपये से बना दिए 50 लाख

Tue, 30 May 2017 09:36 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, करनाल(हरियाणा)
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कमाई का ये नया धंधा है, जिसने आप भी जान लें क्योंकि इससे एक शख्स सिर्फ 500 रुपये लगा कर 50 लाख की कमाई कर रहा है।

 
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ये शख्स हरियाणा के करनाल का रहने वाला है, जिसने खेती छोड़कर ऐसा धंधा शुरु किया है, जो लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन सकती है, इस शख्स ने खेती छोड़ पछली पालन शुरु किया, न सिर्फ मछली पालन किया ब्लकि मछली का बीज तैयार किया और इसके बाद मछली के प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर 35 तरह के मछली के प्रोडक्ट बना रहे हैं। 
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उन्होंने फिश बाइट के नाम से अपना ब्रांड भी बनाया हुआ है। इस सभी से वे 50 लाख रुपए आमदनी ले रहे हैं। सुल्तान सिंह बताते हैं कि उनके पिता परंपरागत खेती करते थे। 1983 में बीए की पढ़ाई के दौरान उन्होंने परंपरागत खेती की बजाए मछली पालने का विचार किया। 

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इसी दौरान 500 रुपए किराए पर एक तालाब खरीदकर 7 हजार रुपए का मछली का बीज डाल दिया। लगभग डेढ़ साल के इंतजार के बाद इससे 1 लाख 62 हजार रुपए का मुनाफा कमाया।  इस मुनाफे से उन्होंने कई गांव के तालाब लीज पर ले लिए और मछली पालन शुरू कर दिया। 1986 में अपने पिता से 5 एकड़ बंजर भूमि की ले ली और उसमें तालाब बनाकर मछली पालन शुरू कर दिया।
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सुल्तान ने बताया कि मछली का बीज कोलकाता से लाना पड़ता था, जिसमें से कुछ खराब हो जाता था। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपने फार्म पर ही बीज बनाने की निर्णय लिया और मछली का बीज बनाने लगे। आज हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के मछली पालक सुल्तान से मछली का बीज खरीदने आते हैं।  
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सुल्तान सीबाज, झींगा, रउ मिरगल, कतला, ग्रास कॉर्प, सिल्वर कॉर्प, कॉमन कॉर्प देशी मंगूर समेत कुल 13 मछलियों का बीज अपने फार्म पर तैयार कर रहे हैं। इस समय सुल्तान सिंह 27 एकड़ में मछली पालन कर रहे हैं। कुल आमदनी लगभग 1 करोड़ रुपए है, जबकि इसमें से 50 प्रतिशत खर्च निकालकर 50 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं। 
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सुल्तान सिंह ने मछली की प्रोसेसिंग यूनिट भी लगा रखी है। वे यहां 35 तरह के प्रोडक्ट बनाते हैं। इनमें फिश फिंगर, फिश कटलेट, फिश बर्गर, फिश टिक्का, बटर फिश मसाला आदि शामिल है। 
 
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सुल्तान सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपने मछली फार्म पर आरएएस (रिसर्कुलेशन एक्वा सिस्टम) लगा रखा है। इससे 10 साल तक एक ही पानी को इस्तेमाल कर सकते हैं। इस सिस्टम से वे पानी के मिनरल्स व अन्य पोषण तत्व को बचा कर रखते हैं और पानी को रिसाइकिल करते रहते हैं। इससे कम पानी में ज्यादा प्रोडक्शन ले रहे हैं।
 
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