पितृपक्ष में प्राय: कौवे, कुत्ते और गाय को भोजन परोसा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्राद्धों में कौवा क्यों जरूरी है? जानने के लिए यह खबर पढ़ें...
Trending Videos
विज्ञापन
2 of 5
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
कौवे को संरक्षण देने के प्रति ना केवल धार्मिक अवधारणा है, बल्कि विज्ञान जगत ने भी इस पर गहन अध्ययन किया है, जिसके अनुसार कौवे और प्रकृति तथा मानव जीवन का गहरा संबंध है।
विज्ञापन
3 of 5
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के हर्बल गार्डन के अधीक्षक डॉ. सुरेंद्र भारद्वाज ने बताया कि कौवा बरगद और पीपल के फल निगलता है। फलों के ऊपर का गुद्दा उसके पेट में पच जाता है और उसके पाचन तंत्र में गुठली के जमाव की प्रक्रिया तैयार होती है। इसकी आंतों में ऐसा एंजाइम होता है जो गुठली को अंकुरित करने के लिए अनुकूल वातावरण देता है।
4 of 5
प्रतीकात्मक तस्वीर
ऐसे में जब कौआ कहीं बीट करेगा, वहां पर बरगद व पीपल का तैयार बीज गिरता है और उसका जल्द ही जमाव होने लगता है। यही वजह है कि इमारतों पर व धरती पर जहां-तहां स्वत: ही पीपल के पेड़ उग जाते हैं। पीपल व बरगद ऐसे पेड़ हैं, जिनमें से ऑक्सीजन 24 घंटे निकलती रहती है। यदि कौवे को संरक्षण ना मिले तो बरगद व पीपल के पेड़ विलुप्त होने का खतरा बढ़ेगा।
उन्होंने बताया कि मादा कौवा भादो के महीने में अंडा देती है। भादो महीने में ही पितृपक्ष आता है। नौ दिन में कौवे का बच्चा अंडे से बाहर निकल आता है। मादा कौवा घरों की छतों से पितरों के निमित्त रखा भोजन उठाकर ले जाती है। यह आहार पौष्टिक होता है, जिसे वह रोजाना अपने बच्चों को खिलाती है। इससे कौवे की प्रजाति भी बढ़ती रहती है। इसलिए इन पौधों का औषधीय महत्व भी है। इनके संरक्षण के लिए कौवे का जीवित रहना जरूरी है। इसलिए कौवे का ग्रास निकाला जाता है।