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झींगुर की 20 नई प्रजातियां मिलीं, निकालते हैं बांसुरी की धुन व पायल की झंकार, पढ़ें- ये रोचक तथ्य

Sat, 12 Dec 2020 03:38 AM IST
ajay kumar सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
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डॉ. रंजना जैसवारा के शोध में खुलासा।
अंधेरा होते ही संगीत की धुन छेड़ देना और उजाला होते ही छिप जाना। आंखमिचौली का यह खेल खेलने वाला कीट है झींगुर। इसे अंग्रेजी में क्रिकेट कहते हैं। इस क्रिकेट का कुनबा अब बढ़ता जा रहा है। यह खुलासा पंजाब विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग में तैनात डीएसटी इंस्पायर फैकल्टी डॉ. रंजना जैसवारा के शोध में हुआ है। 14 साल तक चले शोध में झींगुर की आवाज का विश्लेषण किया गया और पाया कि 20 नई प्रजातियों का जन्म हो गया। इनमें कई झींगुर की आवाजें बांसुरी व पायल बजने जैसी हैं। 
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डॉ. रंजना जैसवारा - फोटो : अमर उजाला
यह प्रजातियां भारत के अलावा दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में मिली हैं। चिंता की बात ये है कि झींगुर की एक प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है, जो ईको सिस्टम हेल्दी करने में कारगर है। वर्ष 2006 में दिखने के बाद यह प्रजाति कहीं नहीं दिखी। हालांकि वैज्ञानिक इसकी तलाश कर रहे हैं। शोध में खास बात ये सामने आई है कि बिना चीरफाड़ किए इन जीवों का पता लगाया गया है। उनकी आवाज को रिकॉर्ड किया गया और विश्लेषण के आधार पर रिजल्ट निकाले गए हैं। 
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झींगुर।
कुछ अलग किस्म का यह शोध वर्ष 2006 में शुरू हुआ था। दुनियाभर में झींगुर की 140 प्रजातियां पाई जाती हैं। झींगुर मैदानी इलाकों में अधिक पाया जाता है। इसकी आयु दो से चार माह ही होती है। जहां-जहां यह पाया जाता है उस इलाके का ईको सिस्टम अधिक हेल्दी होता है। यह झींगुर रात को कई आवाजें निकालता है। कुछ कानों को प्रिय होती हैं, क्योंकि उनकी धुन संगीत जैसी होती है। 

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कई बार सुनकर हम डर भी जाते हैं। अब तक इन पर इनवेजिव मैथर्ड से रिसर्च होता आया है। इस विधि के जरिए कीटों को मारकर उनका डीएनए आदि पता कर उनकी प्रजातियों को खोजा जाता है। अब जो शोध पीयू के जरिए हुआ है उसमें नॉन इनवेजिव मैथर्ड अपनाया गया है यानी झींगुर के पास जाकर उनकी आवाज को रिकॉर्ड किया गया है और उसके बाद सॉफ्टवेयर के जरिए उनका विश्लेषण किया गया है।
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झींगुर।
झींगुर की आवाज के नमूने पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, केरल, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित कई जगहों से लिए गए हैं। यही नहीं दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका के झींगर के भी आवाज के नमूने लिए गए थे। इस शोध में टेरोप्लिसटॉस समेत 20 नई प्रजातियां मिली हैं। इन प्रजातियों की आवाजें अलग हैं। मुंबई से केरल वाले क्षेत्र में बिना आवाज वाले भी झींगुर मिले हैं। साथ ही यह झींगुर कुछ भी खाकर जिंदा रह सकते हैं।
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झींगुर।
रिसर्च के दौरान पाया गया कि डॉग फूड आदि के जरिए भी यह जिंदा रह सकते हैं। लुप्त होती प्रजाति का नाम ग्रेलस क्वाड्रिमाकूलाट्स है जो वर्ष 2006 में ही रिसर्च के दौरान पाई गई थी। उसके बाद आज तक नहीं दिखी। इसके अलावा कई अन्य प्रजातियां भी नहीं मिली हैं। इसका कारण इंडस्ट्री आदि से निकलने वाला धुआं है। शहरीकरण भी एक कारण बना है। मिली प्रजातियों पर अभी शोध चल रहा है। 
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पंजाब विश्वविद्यालय। - फोटो : अमर उजाला
ये हैं नई प्रजातियों की खासियत
  • इनके शरीर पर एक बैंड मिला है।
  • पुरानी प्रजातियों से इनके विंग अलग हैं।
  • आंतरिक अंगों में परिवर्तन है।
  • कुछ भी खाकर यह जिंदा रह सकते हैं।
  • बिना आवाज वाले झींगुर भी इसमें शामिल हैं।
  • कुछ की आवाजें बांसुरी जैसी, पायल की झंकार जैसी भी।

शोध के जरिए झींगुर की कई नई प्रजातियां पाई गई हैं। कुछ प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर भी हैं। इस रिसर्च के लिए नॉन इनवेजिव मैथर्ड अपनाया गया है। शोध में कई परिणाम बेहतर आए हैं। इस पर आगे भी शोध चल रहा है। - डॉ. रंजना जैसवारा, डीएसटी इंस्पायर फैकल्टी जूलॉजी विभाग पीयू ।
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