चंचल मन हर पल नई करवट लेता है। कभी खुद से व्यवहार बदलता है, तो कभी अभिभावक ऐसा माहौल बनाते हैं। बदलाव जिंदगी का पहलु है, लेकिन इस बात को समझने और ध्यान रखने की जरूरत है कि बच्चा गलत ट्रैक पर ना चले पड़े। समझें इन पहलुओं को. . .
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1. चार साल की उम्र में पता चलता है बदलाव
मनोचिकित्सक डा. प्रमोद कुमार के मुताबिक चार साल की उम्र में व्यवहार में बदलाव आना शुरू होता है और ऐसे में ध्यान देने की जरूरत है कि बच्चा किस तरफ बढ़ रहा है। बच्चा जिद्द कर रहा है या ज्यादा मनचला है यह समझने की जरूरत है। अक्सर कुछ लोग इसे बचपन समझकर अनदेखा करते हैं और यहीं से गलती का दौर शुरू होता है। जिन बच्चों का खराब व्यवहार पकड़ में आने के बाद भी ना सुधारा जाए, अक्सर वे आठवीं कक्षा तक आकर एंटी सोशल हो जाते हैं। एंटी सोशल होने के चांस उन बच्चों में ज्यादा होते हैं, जो अकेलापन झेलते हैं। इसका सबसे स्टीक उपाय है कि बच्चों को वक्त दें, उनसे बात करें। अपनी बात समझाएं और उनकी बातें सुने।
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2. कार्टून के करेक्टर बच्चों को बना रहे वायलेंट
जीएमएसएसएस सेक्टर-20 की शिक्षिका अमनदीप कौर के मुताबिक कार्टून करेक्टर बच्चों पर बेहद बुरा असर छोड़ रहे हैं। बच्चे जिस तरह कार्टून में वायलेंस देखते हैं, वैसी ही हरकतें करने लगते हैं। ऐसे में बच्चों में ना सुनने की क्षमता नहीं रह जाती। वे अपनी मांग पूरी करवाने के लिए कुछ कर गुजरते हैं। यह समस्या धीरे-धीरे गंभीर और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। इसमें गलती मां-बाप की है। क्योंकि बचपन में ही बच्चों को टीवी के आगे बैठा देते हैं और कार्टून देखने का आदि बना देते हैं।
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परवरिश के कुछ टिप्स
1. अभिभावक बच्च्चों को क्वालिटी टाइम दें।
2. सिर्फ पढ़ाई नहीं, नैतिक मुल्यों पर भी बात करें।
3. रोल माडल सेलिब्रिटी के अलावा कोई और होना चाहिए।
4. मोबाइल, गैजेट्स से स्कूल स्तर तक दूर रखें।
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परवरिश की पाठशाला
परवरिश के कुछ टिप्स
5. टेलेंट की पहचान कर उसे उभारें।
6. टीचर कोई कमी बताए तो उसे स्वीकार करें।
7. बच्चों में पैसे की धमक ना जमाए।
8. शिक्षण प्रणाली में सुधार करने की जरूरत।
9. व्यवहार के बदलाव को बचपन की शरारत ना समझें।
10. घर का माहौल संस्कारी बनाएं।
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परवरिश की पाठशाला
बच्चों में कमियों के बजाए टेलेंट तलाशें
जीएमसीएच-32 के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डा. रवि गुप्ता के मुताबिक बच्चों में कमियां तलाशने के बजाए टेंलेंट देखें। ऐसा नहीं है कि जो बच्चा नंबरों में पीछे है, वह कुछ नहीं कर पाएगा। इसी सोच को बदलने की जरूरत है। सबसे पहले यह सोच बच्चे के अभिभावक बदलें और धीरे-धीरे समाज में बदलाव आएगा। इसकेअलावा जरूरत है टीचिंग प्रोफेशन में सुधार लाने की। क्योंकि इस प्रोफेशन को सबसे बड़ा दर्जा देकर उथान की तरफ लाया जाएगा तो स्वभाविक है कि बच्चे भी इसकी कद्र करेंगे। मोबाइल जैसे कई उत्पाद बच्चों के लिए अभिभावक आसानी से उपलब्ध करा देते हैं, लेकिन स्कूल स्तर तक मोबाइल बच्चों को नहीं देना चाहिए।
पंजाबी गीत छोड़ रहे बुरा असर
बच्चों के बदलते स्वभाव की बड़ी समस्या के तौर पर संवाद में सामने आई पंजाबी गीतों की शैली। जीएमएसएसएस सेक्टर-23 के प्रिंसिपल चितरंजन सिंह के मुताबिक पंजाबी गीतों में ऐसा माहौल बेचा जा रहा है, जो बच्चों पर बेहद खराब छाप छोड़ रहा है। पंजाबी गीतों में जो शराब, गोलियां और ना जाने कैसे शब्दों का इस्तेमाल कर सोसायटी में संदेश दिया जा रहा है, असल में पंजाबियत ऐसी नहीं है। ऐसे गीत हमारी बाल पीढ़ी को खराब कर रहे हैं। बच्चे चंचल होते हैं और ऐसे में उनको जो दिखाया जाए, वे उससे प्रभावित होकर उसी तरफ चल पड़ते हैं। प्रिंसिपल चितरंजन सिंह के मुताबिक चंडीगढ़ के साउथ एरिया में बने सरकारी स्कूलों की हालत बेहद खराब है। बच्चे नशे के आदी हैं और ऐसा नहीं है कि उनके अभिभावकों को इस बात इल्म नहीं है।