एनजीटी के आदेश को आधार बनाकर नगर निगम ने जून 2020 में जेपी प्लांट को अपने कब्जे में ले लिया था। उसके बाद निगम ने दावा किया था कि कचरे का निस्तारण कर देंगे, मगर मशीनों की क्षमता कम होने के कारण निगम 500 टन में से मात्र 40 प्रतिशत कचरा ही निस्तारित कर सका। उसके बाद बचे कचरे को डंपिंग ग्राउंड पर फेंकना शुरू कर दिया। दबाव बढ़ने के साथ निगम ने प्लांट को निजी हाथों में देने का फैसला लिया। हालांकि, प्लांट के संचालन के लिए 13 कंपनियों ने आवेदन किया है। इन सभी कंपनियों की निगम ने प्रस्तुति भी देख ली है। अब सदन में अंतिम फैसला होगा।
सैनेटरी लैंडफिल पर ही कचरा गिरा दिया
कचरे का पहाड़ बड़ा न दिखे, इसलिए निगम ने कचरे को कॉलोनी की तरफ धकेलना शुरू कर दिया है। यहां निगम ने करोड़ों रुपये से सैनेटरी लैंडफिल बनाई थी। इसके ऊपर भी कचरा डाला जा रहा है। हाल यह है कि कचरा अब डंपिंग ग्राउंड की दीवार से बाहर आकर गिरता जा रहा है। बारिश होने पर लीचैट सीधा लोगों के घरों तक पहुंच जाएगा।
कचरे का पहाड़ एक इंच कम नहीं हुआ
साल 2019 में सपना दिखाया गया था कि एक साल में सारा कचरा निस्तारित कर दिया जाएगा। उसके बाद खाली भूमि पर खेल का मैदान बनाया जाएगा। दो साल होने को हैं लेकिन कचरे का पहाड़ एक इंच भी कम नहीं हुआ है। - दयाल कृष्ण, स्थानीय निवासी
मशीनें पुरानी हैं, इसलिए आ रही है समस्या
गीला कचरा तो पूरा निस्तारित हो रहा है। सूखा कचरा निस्तारित करने वाली मशीन कमजोर है, इसलिए शेष कचरे को डंपिंग ग्राउंड में भेजा जा रहा है। अभी स्मार्ट सिटी की टीम से नए कचरे का आकलन भी कराया है। इस कचरे के निस्तारण का भुगतान जेपी समूह से ही करवाएंगे। - केके यादव, निगम आयुक्त