इस महिला को देखिए। ये ऐसा काम करती है, देखकर हर कोई वाहवाही करता है। इनके काम को देखकर कोई इसके साथ सेल्फी लेता है तो कोई आशीर्वाद दे जाता है।
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ट्राइसिटी की इकलौती ऑटोरिक्शा महिला चालक बलजिंदर कौर
मोहाली के फेज-11 की रहने वाली 32 साल की बलजिंदर कौर ट्राइसिटी की इकलौती ऑटोरिक्शा महिला चालक हैं। बलजिंदर कौर पिछले एक साल से ऑटोरिक्शा चला रही हैं। फेज-11 मोहाली से लेकर इनके रूट में खरड़, बलौंगी, फेज 6 और मोहाली के कुछ अन्य रूट शामिल हैं। तीन-चार घंटे सुबह और 2-3 घंटे शाम को ऑटो चलाती हैं। एक दिन में 250-300 रुपए कमा लेती हैं और उसी से अपने परिवार के 6 सदस्यों का पालन-पोषण कर रही हैं।
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ट्राइसिटी की इकलौती ऑटोरिक्शा महिला चालक बलजिंदर कौर
बलजिंदर के पिता हैंडीकैप्ड हैं और रुई-पिंजाई करके थोड़ा-बहुत कमाते हैं। 1995 में एक भाई की मौत हो गई थी। 2007 में दूसरे भाई को ऑटोरिक्शा चलाते वक्त दिल का दौरा पड़ने से उसकी भी मौत हो गई। इसके बाद इन्होंने कई लोगों को किराए पर ऑटो चलाने को दिया। पर सभी ने कबाड़ समझकर इसका इस्तेमाल किया। इसके कागज तक गुमा दिए। इसके बाद मैने ठाना कि मैं खुद ऑटो चला परिवार को पालूंगी और तब ऑटोरिक्शा चला खुश हूं।
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ट्राइसिटी की इकलौती ऑटोरिक्शा महिला चालक बलजिंदर कौर
बलजिंदर ने बताया कि उन्हें पिछले साल यह ख्याल आया कि क्यों अपनी चीज की बेकदरी करवाएं। मैं क्यों नहीं इसे चला सकती? माता-पिता से विचार किया तो उन्होंने भी पॉजिटिव रिस्पॉन्स दिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शुरुआत में उन्हें काफी मुश्किलें आईं। पहले दिन इतने लोगों के बीच जाना आसान नहीं था। जगह-जगह ऑटो रिक्शा को रोकना भी अजीब लगता। कई पुरुष चालकों ने विरोध किया। ऑटोरिक्शा स्टैंड पर भी पार्किंग नहीं करने देते थे।
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ट्राइसिटी की इकलौती ऑटोरिक्शा महिला चालक बलजिंदर कौर
पुरुष चालक उनके रूट की सवारियां उठाती तो वे लड़ते। इतना तक बोलते कि ये औरतों का काम नहीं। बावजूद इसके मैंने किसी की बात नहीं सुनी। मैं अपना काम शांति से करती रही। अपना अलग रूट बना लिया। इसके बाद मेरे ऑटोरिक्शा में बैठकर महिलाएं तो खुद को सुरक्षित समझती हीं, पुरुष भी मुझ पर गर्व करते। अब लोग मेरे साथ सेल्फी लेने लगे हैं। बुजुर्ग आशीर्वाद में दुआओं के साथ-साथ कभी 50 तो कभी 100 रुपए भी देने लगे।
ट्राइसिटी की इकलौती ऑटोरिक्शा महिला चालक बलजिंदर कौर
बलजिंदर बताती हैं कि उन्होंने किसी शौक के चलते नहीं, बल्कि परिवार की रोजी-रोटी चलाने की मजबूरी के चलते ऑटोरिक्शा चलाना शुरू किया था। पर आज वह इसे काफी एंजॉय कर रही हैं। साथ ही अपने जैसी दूसरी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर भी उभरी हैं। बलजिंदर कहती हैं कि दुनिया का मुकाबला करें, डर के घर पर नहीं बैठा जा सकता। भूखे मरने की बजाय मेहनत करो। मैंने भी मेहनत की है। विरोध हुआ, पर सपोर्ट करने वालों की भी कमी नहीं है।