कारगिल युद्ध के दौरान सेना के अफसर और जवान दुर्गम चोटियों पर दुश्मन से लोहा ले रहे थे, मगर उन तक रसद सामग्री व अन्य जरूरी सामान कैसे पहुंचे, यह बड़ी चुनौती थी।
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कारगिल में तैनात भारतीय सेना
- फोटो : अमर उजाला
गोलाबारी के चलते एलओसी के तमाम गांव खाली हो चुके थे और दुर्गम चोटियों पर जवानों को रसद सामग्री पहुंचाने के लिए कुलियों की मदद नहीं मिल पा रही थी। संयोग से उन दिनों अमरनाथ यात्रा भी चल रही थी। इसलिए सैन्य अफसरों ने यात्रा में श्रद्धालुओं को ढोने के काम में लगे कुलियों को हायर करने का निर्णय लिया। फिर उनकी मदद से ही टोलोलिंग व टाइगर हिल जैसी दुर्गम चोटियों पर दुश्मन से लड़ रहे जवानों तक रसद पहुंचाई गई।
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विजय ज्वाला
- फोटो : अमर उजाला
वेस्टर्न कमांड मुख्यालय में पहुंचे टोलोलिंग कैप्चर करने वाली टीम का नेतृत्व कर रहे लेफ्टिनेंट जनरल अमर ऑल ने यह जानकारी दी। दरअसल, वेस्टर्न कमांड मुख्यालय में कारगिल दिवस के बीस बरस पूरे होने पर दिल्ली से द्रास सेक्टर जा रही ‘विजय ज्वाला’ का स्वागत करने के लिए विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस दौरान लेफ्टिनेंट जनरल अमर ऑल ने टोलोलिंग और टाइगर हिल को किन मुश्किल परिस्थितियों से कैप्चर किया गया, इस बारे में सैन्य अफसरों को जानकारी भी दी।
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सेना के अधिकारियों कर्नल सतीश चंद त्यागी
- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने बताया कि एक तो दुश्मन दिखाई नहीं दे रहा था, ऊपर से चोटियों पर ऑक्सीजन की कमी थी। पथरीले व खतरनाक रास्तों से चोटियों तक पहुंचना बहुत ही मुश्किल था। हालात यह थे चोटियों तक पहुंचते-पहुंचते कई बार रात के समय में जवान रास्ता तक भटक जाते थे। ऊपर से लगातार हो रही गोलाबारी भी उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। दूसरा, दुर्गम चोटियों पर जरूरी सामान व रसद पहुंचाने की दिक्कत थी, जिसे अमरनाथ यात्रा में लगे कुलियों ने हल कर दिया था।
कारगिल शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए 14 जुलाई को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने दिल्ली से ‘विजय ज्वाला’ को द्रास सेक्टर के लिए रवाना किया था। पानीपत, करनाल और अंबाला में इस ‘विजय ज्वाला’ का भव्य स्वागत किया गया। वीरवार को चंडी मंदिर स्थित सेना के मॉनेक शॉ ऑडिटोरियम में इस विजय ज्वाला को मेजर जनरल समीर काला ने रिसीव किया। इस दौरान कारगिल के सभी शहीदों को याद कर उनकी शहादत को नमन किया गया।