कभी जेवलिन खरीदने को पैसे नहीं थे, कहीं से ट्रेनिंग भी नहीं ले सकता था और आज वही नौजवान एशियन गेम्स में भारतीय दल के ध्वजवाहक होंगे। इन्होंने कॉमनवेल्थ में गोल्ड मेडल जीतकर वाहवाही लूटी थी।
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नीरज चोपड़ा
हम बात कर रहे हैं हरियाणा में पानीपत के गांव खंदरा के रहने वाले ज्वेलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा की, जो 18 अगस्त से शुरू हो रहे एशियन गेम्स 2018 में भारत के ध्वजवाहक होंगे। नीरज ने ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 21वें राष्ट्रमंडल खेलों के 10वें दिन भारत की झोली में एक स्वर्ण पदक डालकर इतिहास रचा था। अपने इसी शानदार प्रदर्शन को जारी रखते हुए हाल ही में फ्रांस में भी सुनहरी सफलता हासिल की।
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नीरज चोपड़ा
- फोटो : Getty
नीरज ने 2016 विश्व जूनियर चैंपियनशिप में (86.48 मी) रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता था। दोहा डायमंड लीग में नीरज ने 87.43 मीटर के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन पदक से चूक गए थे और चौथे स्थान पर रहे थे। अब पदक जीतने पर नीरज के कोच उवे होन ने सोशल साइट पर बधाई दी। पूर्व रिकॉर्डधारी जेवलिन थ्रोअर उवे ने कहा कि नीरज तुमने बहुत अच्छा किया, इस लय को कायम रखो।
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नीरज चोपड़ा
- फोटो : Getty
नीरज चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से दो साल पहले ही पासआउट हुए हैं। मौजूदा समय में वे आर्मी में सूबेदार के पद पर नौकरी कर रहे हैं। जेवलिन थ्रोअर बनने की तैयारियों करते हुए एक दौर ऐसा आया, जब नीरज के पास जेवलिन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अच्छी जेवलिन की कीमत डेढ़ लाख रुपये थी, पर नीरज ने हौसला नहीं खोया। पिता सतीश कुमार व चाचा भीम सिंह चोपड़ा से सात हजार रुपये लेकर सस्ता जेवलिन खरीदा और हर दिन आठ घंटे अभ्यास किया।
इसी अभ्यास के बूते नीरज ने अंडर-16, 18 और 20 की मीट जीती व नेशनल रिकॉर्ड बना डाला। इसके बाद इंडिया कैंप में नीरज का चयन हुआ। फिर एक से डेढ़ लाख रुपये तक की जेवलिन से अभ्यास करने का मौका मिला और पोलैंड में अंडर-20 वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में नीरज ने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर इतिहास रच दिया। नीरज ने जेवलिन थ्रो सीखने के लिए कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली हैं, बल्कि उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो देखकर इस खेल में अपना आप को बेहतर बनाया है।
चाचा भीम सिंह बताते हैं कि नीरज में इस खेल को लेकर इतना जुनून था कि जब वह पानीपत के शिवाजी स्टेडियम में तैयारी करता था तो वे नीरज को अपने साथ बाइक पर लेकर जाते थे। एक दिन उन्होंने देखा कि नीरज एकांत में बैठकर रो रहा था। उसने पूछा तो काफी देर तक नीरज ने कुछ नहीं बताया। कई बार पूछने पर उसने बताया कि उसके भाले की आगे की नोंक टूट गई है। नया भाला बहुत महंगा आता है। उसने कई जगह भाले का रेट पता किया। उस वक्त मैं उधार पैसे लेकर नीरज के लिए 25 हजार का भाला लेकर आया था।
नीरज उस नए भाले को देखकर काफी खुश हुआ था। उसने भाले को चूम लिया और वही भाला उसकी जिंदगी बन गया। नीरज चोपड़ा का जन्म 24 दिसंबर 1997 को सतीश कुमार व सरोज देवी के घर हुआ। नीरज के परिजन साधारण किसान हैं। नीरज के पिता जहां खेती करते हैं, वहीं उनकी माता ग्रहणी है। नीरज के परिवार की खास बात यह है कि उनके पिता चार भाई है और उनका संयुक्त परिवार है। घर में परिवार के सभी 17 सदस्यों के लिए एक ही चूल्हे पर भोजन बनता है।
नीरज के पिता व तीनों चाचा मात्र डेढ़ एकड़ भूमि में ही खेती करके अपने संयुक्त परिवार को पाल रहे हैं। नीरज की कक्षा नौ तक की शिक्षा खंदरा के पास स्थित गांव भालसी में भारतीय विद्या निकेतन स्कूल में हुई। इसके बाद नीरज ने कक्षा 10 से लेकर 12 तक की पढ़ाई ओपन स्कूल से की। इस समय नीरज भारतीय थल सेना में सूबेदार के पद पर नियुक्त है और कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में बीए का विद्यार्थी है। नीरज को मिली अभूतपूर्व सफलता से उसका परिवार ही नहीं, बल्कि पानीपत जिला में खुशी का माहौल है।