सोशल मीडिया पर पोस्ट को लेकर विवादों में रहीं शहीद कैप्टन की बेटी गुरमेहर कौर एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह कुछ और ही है।
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Gurmehar kaur
दरअसल, जालंधर की रहने वाली गुरमेहर कौर आजकल नए मिशन पर हैं, वो भी एक नहीं दो दो। गुरमेहर कौर अब अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर आंदोलन चलाएंगी। गुरमेहर ने फ्यूचर टैलेंट नाम की संस्था के साथ 'रिस्पॉसिबल फ्रीडम ऑफ फोरम' का गठन किया है। इसके माध्यम से वह बोलने की आजादी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम छेड़ेंगी। फोरम के प्रधान गौतमबीर सेठ बनाए गए हैं और गुरमेहर इसकी राष्ट्रीय उपप्रधान हैं।
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मीडिया से रूबरू हुईं गुरमेहर
- फोटो : File Photo
गुरमेहर कौर ने कहा कि वह पहले भी पीछे नहीं हटी थीं और अब वह फिर खुल कर मैदान में आ गईं हैं। उन्होंने कहा वह पंजाब की धरती पर पैदा हुई हैं व गुरुओं के बताए मार्ग पर चलकर संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने बताया कि 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' नाम से एक आंदोलन पूरे देश में चलाया जाएगा। जालंधर से इसका एलान इसलिए किया गया है क्योंकि यह हमारा अपना शहर है।
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गुरमेहर ने बताया कि फोरम के कर्नाटक, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पंजाब के प्रदेश प्रधानों की नियुक्ति कर दी गई है। पदाधिकारी आगे अपने संगठनात्मक ढांचे का विस्तार करने में जुट गए हैं। फोरम के प्रधान गौतमबीर सेठ ने बताया कि अगस्त में दिल्ली में युवा सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इसमें पांच हजार से ज्यादा युवाओं के भाग लेने की उम्मीद है।
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गुरमेहर
दूसरा मिशन ये कि गुरमेहर कौर अपनी जिंदगी पर आधारित एक किताब लिख रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक 'मोमेंट्स ऑफ फ्रीडम' शीर्षक के नाम गुरमेहर किताब लिखने में व्यस्त हैं, जिसके अगले साल जनवरी में आने की उम्मीद है। इसका खुलासा उन्होंने जालंधर में एक प्रेस कांफ्रेंस में किया।
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गुरमेहर के मुताबिक, लोग अक्सर आपके मुंह में अपनी बातें ठूंसने का प्रयास करते हैं, वही सुनना चाहते हैं जो उन्हें रास आता है, इसीलिए वह अब खामोश रहकर अपनी तमाम बातें किताब के माध्यम से लोगों के बीत रखेंगी। गुरमेहर ने यह भी बताया कि पिछले दिनों डीयू (दिल्ली विश्वविद्यालय) हंगामे के दौरान उनके जज्बातों को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया, इसलिए वह अब अपनी कहानी ठीक समय पर बयां करने जा रही हैं।
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गुरमेहर के मुताबिक, उनकी किताब में पारिवारिक संवेदनशीलता के काफी करीब होगी, किताब में ऐसी बातें होंगी जो उन्होंने अपनी मां और दादी से सीखीं। वह कहती हैं कि मां और दादी ने बच्चों की अकेले ही परवरिश की, इसलिए किताब में तीन महिलाओं के संघर्ष, साहस और अनुभवों की बातें होंगीं। गुरमेहर की मानें तो किताब में युद्ध के मुद्दे को भी उकेरा जाएगा।
गुरमेहर की किताब में 70 वर्षों का एक सैनिक के परिवार का अनुभव होगा। गुरमेहर किताब लिखने के पीछे एक और दिलचस्प वजह बताती हैं। वह कहती हैं कि 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने निकोलस स्पार्क की किताब पढ़कर अल्जाइमर की बीमारी के बारे में जाना और तब से वह इस बात को लेकर डरती रहीं कि अगर बीमारी उन्हें हो गई तो पिता की सारी यादें छू मंतर हो जाएंगी, इसलिए उन यादों को किताब में पिरोना ठीक लगा।