बहादुर बेटी को सलाम, पिता घोड़ागाड़ी पर माल ढोते हैं और बेटी ने देश को एशिया का चैम्पियन बनाकर उनका सिर फक्र से ऊंचा कर दिया। जानिए कौन हैं ये होनहार...
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रानी रामपाल
- फोटो : sportstarlive
बात हो रही है, भारतीय महिला हॉकी टीम की कैप्टन और फास्ट फॉरवर्ड प्लेयर रानी रामपाल की। इनकी अगुवाई में महिला हॉकी टीम ने चीन को हराकर एशिया कप 2017 जीत लिया। फाइनल मुकाबले में दोनों टीमें 4-4 से बराबर रहीं। भारत के लिए कैप्टन रानी रामपाल ने ही निर्णायक पांचवा गोल किया और देश 13 साल बाद एशिया का सिरमौर बन गया। इसके साथ ही टीम ने अगले साल इंगलैंड में होने वाले विश्वकप के लिए क्वालीफाई कर लिया।
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hockey player rani rampal
- फोटो : amarujala
महिला हॉकी टीम ने दूसरी बार एशिया कप जीता है। आखिरी बार 2004 में यह खिताब जीता था, वहीं टीम की उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई दी है। दूसरी ओर, टीम की जीत के बाद कप्तान रानी रामपाल के घर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। रानी रामपाल को नए हेड कोच हरेन्द्र सिंह के मार्गदर्शन में सीनियर महिला एशिया कप हॉकी टूर्नामेंट खेलने के लिए भारत की 18 सदस्यीय टीम की कप्तानी सौंपी गई थी।
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hockey player rani rampal
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वहीं अपनी इस उपलब्धि से रानी रामपाल बेहद खुश हैं। वे सबसे ज्यादा खुश हैं, ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने पर। वे कहती हैं कि मुझे पूरा विश्वास था कि हमारी टीम जापान में महिला एशिया कप में बेहतरीन प्रदर्शन करेगी। हमें जहां भी खेल में सुधार की जरूरत थी, हमने वे सुधार किए। हमारी टीम एक इकाई के तौर पर बढ़िया खेली। जापान में एशिया कप में बेहतरीन प्रदर्शन कर लंदन में होने वाले महिला एशिया कप के लिए क्वॉलिफाई करना हमारा टारगेट था।
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रानी रामपाल
हरियाणा में अंबाला के एक छोटे गांव की बेटी रानी रामपाल की जिंदगी बचपन से ही दुश्वारियों से गुजरी। पिता ठेला चलाते थे और आज जब बेटी एक मुकाम पर पहुंच गई है, दुनिया में नाम रोशन कर रही है, पिता आज भी घोड़ागाड़ी ही हांकते हैं। वहीं रानी को इस बात की जरा भी हिचक नहीं है कि उसके पिता आज भी मजदूरी करते हैं, बल्कि उसे अपने पिता पर गर्व है और इसलिए अपने नाम के साथ पिता का भी नाम लगा रखा है।
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हॉकी प्लेयर रानी रामपाल
रानी रामपाल को अर्जुन व भीम अवार्ड से नवाजा जा चुका है। रानी रामपाल खुद बताती हैं कि घर में इतने पैसे भी नहीं थे कि वे मेरे लिए हॉकी भी खरीद सकें, लेकिन मेरे सपनों में उड़ान थी और उन्हीं सपनों और इच्छाओं को देखते हुए पिता ने मुझे गांव की एकेडमी में डाल दिया। भाई कारपेंटर था तो पिता और भाई दोनों के साथ की वजह से मेरी प्रैक्टिस किसी तरह चलती रही। एकेडमी को द्रोणाचार्य अवॉर्ड विजेता बलदेव सिंह चलाते थे।
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हॉकी प्लेयर रानी रामपाल
रानी बताती हैं कि पिता की मेहनत की बदौलत ही मैंने हॉकी खेलने के सपने को साकार किया और टीम इंडिया के साथ उसका रियो तक का सपना पूरा कराया। रियो ओलंपिक में भारत और जापान की महिला हॉकी टीम का मैच दो-दो की बराबरी पर छूट गया। एक समय ऐसा लग रहा था कि भारत यह मैच हार जाएगा, लेकिन आखिरी वक्त में मैच ड्रॉ हो गया।
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हॉकी प्लेयर रानी रामपाल
रानी कहती हैं कि मैं अपनी हर उपलब्धि के लिए कोच बलदेव सिंह की ऋणी हूं। मेरा परिवार जिस समय पैसे नहीं जुटा पाया था, मेरे कोच ने मेरे हाथ में हॉकी स्टिक थमा दी थी। मै उनकी शुक्रगुजार हूं। कोच बलदेव सिंह भी कहते हैं कि रानी को हमेशा जीत दिखती थी, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उसके सामने कौन सी टीम खेल रही है।
चौदह साल की उम्र में रानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेब्यू करने वाली सबसे छोटी उमर की खिलाड़ी बनी। जब वह 15 साल की थी, 2010 में वह विश्व महिला कप की सबसे छोटी खिलाड़ी थी। उसने क्वाड्रिनियल टूर्नामेंट में सात गोल भी मारे थे। रानी ने इंग्लैंड के खिलाफ निर्णायक गोल दागा था, जिसकी बदौलत भारत ने हॉकी जूनियर विश्व कप में कांस्य पदक जीता था। अपने प्रदर्शन की बदौलत ही रानी ने रेलवे में क्लर्क की नौकरी हासिल की थी।