देश के जाने माने वैज्ञानिक और पद्म विभूषण प्रोफेसर यशपाल अब नहीं रहे। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके एक दोस्त ने प्रोफेसर की निजी जिंदगी से जुड़े कई राज खोले, जानिए।
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मशहूर वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल
पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के वाइस चांसलर प्रोफेसर अरुण ग्रोवर बताते हैं कि पंजाब यूनिवर्सिटी से उनकी खास यादें जुड़ी हैं। 1997 से 99 तक प्रो. यशपाल पीयू के फिजिक्स विभाग में ऑनररी प्रोफेसर रहे। उन्होंने एक बार पीयू में लेक्चर भी दिया था और अक्सर यहां आते रहे। दिवंगत आत्मा की शांति के लिए मंगलवार को फिजिक्स विभाग के विद्यार्थी जमा हुए और प्रार्थना की। पीयू के वीसी प्रो. अरुण ग्रोवर ने भी शोक जताया और प्रो. यश के साथ बिताए कुछ पल भी साझा किए।
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प्रोफेसर अरुण ग्रोवर ने अपने शोक संदेश में कहा कि प्रोफेसर यशपाल को काफी समय से जानते थे। जब वे स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के फाउंडर डायरेक्टर थे। फिर पीयू में आने के बाद भी उनसे मुलाकात का मौका मिला। वे सभी के लिए प्रेरणादायक हस्ती थे। वे अच्छे स्वभाव के धनी इंसान थे। अगर क्वालिटी एजूकेशन की बात करें, तो उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया। पीयू में भी लेक्चर देकर उन्होंने काफी कुछ सीखाया। उनके जाने से दुख है।
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प्रोफेसर अरुण ग्रोवर बताते हैं कि स्टूडेंट लाइफ से लेकर अब तक उनके जीवन पर प्रोफेसर यशपाल का प्रभाव रहा। जब वह पढ़ते थे तो प्रो यशपाल का एक आर्टिकल अंग्रेजी के अखबार में सेंट्रल पेज पर छपा था। इसमें उन्होंने लिखा था कि आप साइंस को चुन रहे हैं, लेकिन क्या आपने इसके लिए अपनी क्षमताओं को परखा है। उनका कहना था कि ऐवरेज लेवल की साइंस न तो आपको संतुष्टि देगी और ना ही दूसरों को।
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प्रोफेसर ग्रोवर ने बताया कि अप्रैल 2015 में प्रोफेसर यशपाल आखिरी बार पंजाब यूनिवर्सिटी आए थे। तब उन्होंने प्रोफेसर बीएम आनंद ऑडिटोरियम में लेक्चर दिया था। रुचिराम साहनी पर पोस्टल स्टैंप जारी करने के भी 2013 में प्रो. यशपाल खासतौर पर पहुंचे थे। स्कूली बच्चों के बैग को हल्का करने की सिफारिश प्रोफेसर यशपाल ने ही की थी। उनको चिंता थी कि बच्चों के भारी-भरकम स्कूली बैग कंधों पर बोझ हैं। इस सोच पर अब काम होने भी लगा है।
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वहीं पंजाब यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर प्रोफेसर आरपी भांभा ने उनसे जुड़ी एक याद साझा कि और बताया कि 1947 का दौर जब देश में हिंदू-मुस्लिम फसाद जोरों पर थे। जिंदा रहने की कोशिश में हिन्दू लड़कों का एक ग्रुप था, जिसमें मैं और यशपाल भी थे। भीड़ के हमले से बचने के लिए उन्होंने लाहौर यूनिवर्सिटी की लैब से अमोनिया का जार चुराया और एक फ्यूज बल्ब में भरकर इसको बम बनाने की कोशिश की थी।
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मशहूर वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल
बता दें कि 26 नवंबर 1926 को झांग (अब पाकिस्तान में) में प्रोफेसर यशपाल का जन्म हुआ था। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से 1949 में फिजिक्स में ग्रेजूएशन किया और 1958 में पीएचडी की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से की थी। प्रोफेसर यशपाल कई अहम पदों पर रहे। इसमें 1963 से 1984 तक योजना आयोग के मुख्य सलाहकार, 1984 से 1986 में यूजीसी के प्रेसिडेंट जैसे पद शामिल हैं।
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यशपाल दूरदर्शन पर साइंस से जुड़े प्रोग्राम्स के सलाहकार बोर्ड में भी शामिल रहे। 1973 में सरकार ने उन्हें स्पेस ऐप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद का पहला डायरेक्टर अप्वाइंट किया गया। 1983-84 में वह प्लानिंग कमिशन के चीफ कंसल्टेंट भी रहे। 2007 से 2012 तक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के वाइस चांसलर भी रहे। 25 जुलाई को प्रोफेसर यशपाल का लंबी बीमारी के बाद नोएडा में निधन हो गया, वो 90 साल के थे।
प्रोफेसर यशपाल कॉस्मिक रेज़ पर रिसर्च से प्रसिद्ध थे। साल 2013 में प्रोफेसर यशपाल को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। 1976 में पद्म भूषण, 1980 में विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए मैक्रोनी इंटरनेशनल फेलोशिप अवार्ड, 1987 में इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन का प्रतिष्ठित जीपी चैटर्जी मेमोरियल अवार्ड, 1989 में एसोसिएशन ऑफ साइंस एक्सप्लोरर अवार्ड, 2009 में विज्ञान के लोकप्रिय बनाने के लिए कलिंगा सम्मान प्रोफेसर यशपाल को मिला।