13 अप्रैल 1919 को हुआ अमृतसर का जलियांवाला बाग कांड पूरी दुनिया के लिए बड़ी त्रासदी थी, लेकिन अमृतसरियों को इसके बाद 19 अप्रैल को एक और बर्बर त्रासदी झेलनी पड़ी थी। ये था जनरल डायल का 19 अप्रैल को जारी किया गया 'क्रॉलिंग ऑर्डर'।
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खुलासाः जलियांवाला बाग के बाद भी हुआ था 'बर्बर' कांड
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इतिहास शोधकर्ता सुरेंद्र कोछड़ बताते हैं कि विश्व के इतिहास में किसी विद्रोह को दबाने के लिए इतने बर्बर कर्म शायद ही कभी किए गए हों, जितने जलियांवाला बाग के नरसंहार के बाद अमृतसर के नागरिकों के साथ किए गए थे।
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सुरेंद्र कोछड़ ने बताया कि 13 अप्रैल 1919 को स्थानीय हॉल ब्रिज (पोढ़ियांवाला पुल) के स्थान पर अमृतसर के डीसी द्वारा नगरवासियों के शांतिपूर्ण जुलूस पर बिना चेतावनी गोली चलवा दी गई। इसमें 20 लोग मारे गए और बहुत से घायल हो गए।
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भड़के लोगों ने पांच अंग्रेजों को पीटकर मार दिया और करीब दो दर्जन सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया। इसी भीड़ में से कुछ लोग ढाब खटीकां के अंदरूनी बाजारों की तरफ हो लिए। ये लोग लौहगढ़ के अंदर आबादी कूचा कोढ़ियां में पहुंचे।
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इस दौरान चर्च ऑफ इंग्लैंड जनाना मिशनरी सोसाइटी के लिए काम करने वाली और अमृतसर सिटी मिशन स्कूल की मैनेजर मिस मार्शिला शेरवुड अपने साइकिल पर घर लौट रहीं थीं। वे भीड़ के शिकंजे में आ गईं। भीड़ में शामिल कुछ युवकों ने उन्हें उस वक्त तक लाठियों से पीटा, जब तक वह मर नहीं गईं।
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15 अप्रैल को शहर में फौजी कानून लागू करने के बाद 19 अप्रैल को जब जनरल डायर ने शहर के अंदरूनी क्षेत्रों में गश्त की, तो उसे शेरवुड के बारे में पता चला। इस पर डायर ने कहा कि जिस गली में एक अंग्रेज महिला ने अत्याचार सहे हैं, वह हिंदुस्तानियों के लिए एक धार्मिक गली साबित होनी चाहिए।
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डायर ने तुरंत अपने सैनिकों को हुक्म दिया कि इस गली से निकलने वाले हर हिंदुस्तानी को पेट के बल रेंगकर निकलना होगा। यदि रेंगने वाला जरा भी घुटनों को उठाता या मोड़ता तो उसकी पीठ पर बंदूक की पिछली साइड से वार किया जाता और उसे गली के बीच लगाई टिकटिकी से बांधकर निर्वस्त्र कर कोड़े लगाए जाते।