क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसा गुरुद्वारा है, जिसके नाम में मंदिर है और जिसकी नींव एक मुसलमान ने रखी थी। तस्वीरों में देखिए ये रिपोर्ट...
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श्री दरबार साहिब (स्वर्ण मंदिर)
ये विशाल रसोई है, अमृतसर स्थित वर्ल्ड फेमस गुरुद्वारा गोल्डन टैंपल में। गुरुद्वारा के विशाल परिसर में मौजूद गुरु रामदास लंगर हाल में रोजाना 70 हजार से एक लाख तक लोग मुफ्त लंगर ग्रहण करते हैं। छुटिटयों में ये आंकड़ा बढ़ जाता है। खाने का स्वाद भी लजीज होता है। इस वजह से गुरुद्वारे का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। इसे मोस्ट विजिटेड प्लेस ऑफ द वर्ल्ड अवार्ड दिया गया है।
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Golden Temple, Amritsar
मतलब, स्वर्ण मंदिर दुनिया का सबसे ज्यादा विजिट किए जाने वाला धर्मस्थल है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के बाद दूसरी सबसे बड़ी संस्था वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स यूके ने श्री दरबार साहिब को इस सम्मान के लिए चुना। लंदन से शुक्रवार को पहुंची टीम ने मोस्ट विजिटेड प्लेस ऑफ द वर्ल्ड अवार्ड शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) को सौंपा।
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golden temple amritsar
दुनिया भर के धार्मिक स्थलों में से यहां पर श्रद्धालुओं के आने का आंकड़ा विश्व रिकॉर्ड में सर्वाधिक है। सबसे बड़ा लंगर लगाने का श्रेय भी श्री दरबार साहिब को दिया गया है। यह कहा गया है कि विश्व में सबसे बड़ी सेवा श्री दरबार साहिब में लंगर भवन में दिखती है, जहां कोई मजहब सेवा में आड़े नहीं आता। इसके अलावा मंदिर के अंदर की साफ-सफाई, लोगों की सेवा भावना, 24 घंटे चलने वाले कीर्तन ने इसे अवार्ड दिलाया।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
लंगर में ऑटोमेटिक रोटी मेकर मशीन से एक घंटे में 25 हजार रोटी बनती है। इसके अलावा रोजाना 70 क्विंटल आटा, 20 क्विंटल दाल, सब्जियां, 12 क्विंटल चावल लगता है। 500 किलो देसी घी इस्तेमाल होता है। सौ गैस सिलेंडर, 500 किलो लकड़ी की खपत होती है।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
गोल्डन टैंपल में 24 घंटे लंगर चलता है। शुद्ध शाकाहारी भोजन तैयार करने वाले यहां के कर्मचारी नहीं, ब्लकि सेवादार होते हैं, जोकि सेवाभाव से श्रद्धालुओं से लंगर तैयार करते हैं। बाद में उन्हें पंक्तियों में बैठाकर ग्रहण करवाते हैं। सभी कुछ काफी प्रेमभाव से होता है।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
गुरु रामदास लंगर के मैनेजर का कहना है कि भोजन में क्या-क्या पकेगा, यह पहले से ही तय होता है। जैसे ही लोग पंक्तियों में बैठते हैं, तुरंत भोजन परोसना शुरू कर दिया जाता है। जैसे ही वे भोजन खाकर उठते हैं, बैटरी चालित मशीन से लंगर हाल की सफाई कर दी जाती है ताकि दूसरे लोग आकर बैठ सकें।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
मैनेजर कहते हैं कि इतनी बड़ी रसोई से रोजाना खाना बनाने के लिए पैसा दुनिया में बसे लाखों सिख परिवार भेजते हैं। वे अपनी कमाई का दसवां भाग गुरुद्वारों की सेवा में अर्पित करते हैं। इन्हीं पैसों से गुरुद्वारों की प्रबंध और लंगर का खर्च चलता है।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
शिरोमणि कमेटी के प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ कहते हैं कि चूंकि लंगर का सारा कामकाज सेवा भावना और मन से किया जाता है, इसलिए यहां सब-कुछ अच्छा होता है। वैसे यहां इस्तेमाल होने वाली सभी वस्तुओं की क्वालिटी की परख की जाती है।
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गोल्डन टेंपल की रसोई
श्री गुरु रामदास सराय में गुरुद्वारे में आने वाले लोगों के लिए ठहरने की व्यवस्था भी है। इस सराय का निर्माण सन 1784 में किया गया था। यहां 228 कमरे और 18 बड़े हॉल हैं। यहां पर रात गुजारने के लिए गद्दे व चादरें मिल जाती हैं। एक व्यक्ति की तीन दिन तक ठहरने की पूर्ण व्यवस्था है।
वैसे तो गुरुद्वारे में रोज ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में ज्यादा भीड़ होती है। बैसाखी, लोहड़ी, गुरुनानक पर्व, शहीदी दिवस, संगरांद (संक्रांति) जैसे त्योहारों पर पैर रखने की जगह नहीं होती है। इसके अलावा सुखासन और प्रकाशोत्सव का नजारा देखने लायक होता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से अरदास करने से सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं।