फोन आया कि प्रमोशन होने वाला है। मैं इंसपेक्टर से डीएसपी बनने वाला हूं लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, तस्वीरें
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सीआरपीएफ इंस्पेक्टर रघुबीर सिंह
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिला स्थित बुरकापाल में नक्सली हमले में शहीद हुए अमृतसर के सठियाला गांव निवासी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) इंसपेक्टर रघुबीर सिंह के दोनों बच्चे (बेटा त्रिलोचन व बेटी सिमरन) नक्सलियों के खिलाफ हथियार उठाने को तैयार हैं।
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Martyr Raghubir Singh
बेटे की उम्र 22 वर्ष है तो बेटी अभी 17 वर्ष की है। पहले रघुबीर सिंह पोस्टिंग के दौरान परिवार को साथ रखते थे। पिछले दो सालों से छत्तीसगढ़ में पोस्टिंग हुई तो दोनों बच्चे की पढ़ाई के खातिर पत्नी बलजीत कौर का चंडीगढ़ में रहने का प्रबंध कर दिया था। बेटा बीटेक कर रहा है और बेटी प्लस वन में है।
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Martyr Raghubir Singh
मंगलवार सुबह शहीद रघुबीर सिंह का तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को छत्तीसगढ़ से दिल्ली और दिल्ली से पठानकोट सेना के हैलीकाप्टर में लाया गया। पठानकोट से रघुबीर सिंह का शव कुछ देर के लिए उनके ससुराल (बटाला के पास गांव उधनवाल) ले जाया गया। वहां उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इलाके के विधायक संतोख सिंह भलाईपुर समेत जिला प्रशासनिक अधिकारी शहीद के घर पहुंचे।
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Martyr Raghubir Singh
उधर, गांव सठियाला में करीब 85 घर हैं। रघुबीर सिंह की शहादत के बाद किसी घर में चूल्हा नहीं जला। गांव के स्कूल में छुट्टी कर दी गई वहीं सारा गांव शहीद को नमन करने उसके पैतृक घर के बाहर जमा रहा। बलजीत कौर (40) चंडीगढ़ में रहते हुए हर रोज पति से फोन पर बात करती थी। दो दिन पहले ही उसकी बात फोन पर हुई तो रघुबीर ने कहा था कि प्रमोशन होने वाला है। मैं इंसपेक्टर से डीएसपी बनने वाला हूं। प्रमोशन मिलते ही छुट्टी लेकर घर आऊंगा। उसके बाद रघुबीर सिंह से बात नहीं हुई।
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Martyr Raghubir Singh
अखबार में खबर पढ़कर शहादत का पता चला
शहीद के बड़े भाई गुरमुख सिंह कहते हैं कि हमें रघु की शहादत के बारे में जानकारी मंगलवार सुबह अखबारों से मिली। हमारे पास कोई फोन नहीं आया। सीआरपीएफ के पास रघुबीर सिंह की पत्नी बलजीत कौर का जो नंबर था। यह नंबर रॉग था। इस नंबर को चलाने वाले सज्जन कहते हैं कि सुबह से सैकड़ों फोन आ गए। हमें तो पता ही नहीं है कि रघुबीर कौन है।
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Martyr Raghubir Singh
दस भाई बहनों के दुलारे थे रघुबीर
रघुबीर सिंह की कुल दस भाई बहन हैं। इनमें महिंदर कौर, परमजीत कौर, धर्मेंद्र कौर की मौत हो चुकी है। जबकि सबसे छोटी बहन सुरजीत कौर कहती है कि ‘रघु वीरां हुण मैं रक्खड़ी किन्नू बन्नागी’। पिता संतोख सिंह व मां प्रकाश कौर की मौत हो चुकी है। छह भाईयों में महेंद्र सिंह, गुरमुख सिंह, कुलदीप सिंह, विक्रम सिंह व हरजिंद्र सिंह हैं। महेंद्र सिंह एयरफोर्स से रिटायर हैं। महेंद्र सिंह को प्रेरणा मानने वाले रघुबीर ने खुद ही सीआरपीएफ में भर्ती होने की जिद की थी। भाई गुरमुख कहते हैं कि रघुबीर सिंह की शहादत पर हमें गर्व है लेकिन उसकी कमी सदैव खलेगी।
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शहीद रघुबीर सिंह का परिवार
‘बड़े चेते आउंदे ने यार अनमुल्ले...’
डॉक्टर विक्रम सिंह। सठियाला गांव के इकलौते शख्स हैं, जिनके साथ शहीद रघुबीर सिंह की दांत काटी रोटी थी। दोनों जिगरी यार थे। साथ-साथ पढ़े और जवान हुए। रघुबीर सिंह सीआरपीएफ में भर्ती हो गए और विक्रम सिंह डॉक्टर बन गए। दोनों के बीच फोन पर बातचीत अक्सर होती रहती थी। करीब ढाई महीने पहले दोनों मिले थे और दोनों ने फ्यूचर प्लानिंग के लिए कई बातों पर चर्चा भी की थी।
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सीआरपीएफ इंस्पेक्टर रघुबीर सिंह
डॉक्टर विक्रम सिंह की आंखें अपने जिगरी दोस्त के लिए बरस रही थी लेकिन फख्र इस बात का था कि वह शहीद रघुबीर सिंह के दोस्त हैं। कहते हैं कि रघु जैसा यार मिलना मुश्किल है, मेरा दिल अभी भी गवाही नहीं दे रहा है कि मेरा यार अब दुनिया में नहीं रहा और उसने देश के लिए शहादत दे दी। रघु को मैं कभी भूल नहीं सकता। उसकी हर बात जैसे कानों में गूंज रही हो। ऐसा लगता है कि वो अभी आकर कहेगा ‘चल वीरें आपां चलिए खेता नूं, उत्ते जिंदगी दीया दो-चार गल्लां करांगे’।
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Martyr Raghubir Singh
गांव सठियाला में शहीद रघुबीर सिंह की शहादत पर हर आंखें सजल थी तो हर सीना गर्व से ऊंचा। अब तक यह गांव केवल सठियाला था अब इस गांव को लोग शहीद रघुबीर सिंह सठियाला के नाम से जानेंगे। रघुबीर सिंह सठियाला को गांव में रघु कहते थे। रघु के साथ स्कूल व कालेज की पढ़ाई पूरी करने वाले डाक्टर विक्रम सिंह कहते हैं कि वह बचपन से ही मेहनती थे। स्पोर्ट्स कोटे में वह सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। जब भी छुट्टी मिलती गांव आकर वह इंसपेक्टर रघुबीर सिंह रघु बन जाते।
उन्होंने बताया रघु बचपन से ही एथलीट में अव्वल आता रहे हैं। गांव के ग्राउंड में वह जून-जुलाई की दोपहर में दौड़ लगाते देख गांव वाले जब उसे समझाते कि धूप अधिक है तो वह हंसते हुए कहते कि मैं देश की रक्षा के लिए अपने शरीर को लोहा बना रहा हूं, ताकि दुश्मनों के साथ लोहा लेे सकूं। उसकी इच्छा थी कि गांव में वह स्टेडियम बनाएं। आज रघुबीर देश के लिए शहीद हुआ है, मैं चाहता हूं कि सरकार उसके नाम से गांव में स्टेडियम बनाए। रघुबीर की इच्छा थी कि नशामुक्त समाज हो और देश के लिए गांव और आसपास इलाकों से जांबाज जवान तराशे जा सके।