पानीपत के मैदान में काफी ऐतिहासिक लड़ाईयां लड़ी गईं। आज भी एक स्मारक मौजूद है, 'काला अंब', जिसकी बेहद रोचक कहानी है। देखिए, ये रिपोर्ट।
Trending Videos
विज्ञापन
2 of 7
आम के पेड़ से निकलता था खून, काला अंब पानीपत
- फोटो : हेमंत बुद्धिराजा
'काला अंब' मतलब काला आम। कहा जाता है कि पानीपत के तृतीय युद्ध के दौरान इस जगह पर एक काफी बड़ा आम का पेड़ होता था। लड़ाई के बाद सैनिक इसके नीचे आराम करते थे। यहां हुए युद्धों में इतना रक्त बहा कि इस इलाके की मिट्टी लाल हो गई। असर आम के पेड़ पर भी पड़ा। रंग काला पड़ गया।
विज्ञापन
3 of 7
आम के पेड़ से निकलता था खून, काला अंब पानीपत
- फोटो : हेमंत बुद्धिराजा
तभी से इस जगह को 'काला अंब' यानी काला आम के नाम से जाना जाने लगा। युद्ध में तकरीबन 70,000 मराठा सैनिकों की मौत हो गई थी। पेड़ पर लगे आमों को काटने से खून की तरह लाल रस निकलता था। इसलिए अगर ये कहें कि यहां के आम से खून निकलता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
4 of 7
आम के पेड़ से निकलता था खून, काला अंब पानीपत
- फोटो : हेमंत बुद्धिराजा
कई वर्षों बाद इस पेड़ के सूखने पर इसे कवि पंडित सुगन चंद रईस ने खरीद लिया। सुगन चंद ने इस पेड़ की लकड़ी से खूबसूरत दरवाजे बनवाए। यह दरवाजा पानीपत म्यूजियम में रखा गया है। अब इस जगह पर एक स्मारक बनाया गया है, जिसे 'काला अंब' कहा जाता है।
विज्ञापन
5 of 7
आम के पेड़ से निकलता था खून, काला अंब पानीपत
- फोटो : हेमंत बुद्धिराजा
माना गया कि आम का रंग काला इसलिए हुआ, क्योंकि यह उस मिट्टी में पैदा हुआ था जिसमें सैनिकों का खून मिल गया था। ज़ाहिर है, यह पेड़ बहुत समय तक गायब रहा था। इस स्मारक को ’काला’ कहने का वास्तविक कारण यह भी हो सकता है कि इसके पत्ते गहरे हरे रंग के हैं।
विज्ञापन
6 of 7
आम के पेड़ से निकलता था खून, काला अंब पानीपत
- फोटो : अमर उजाला
इस जगह पर लोहे की छड़ के साथ ईंट से बना एक स्तंभ है। इस स्तंभ पर अंग्रेज़ी और उर्दू में लड़ाई के बारे में एक संक्षिप्त शिलालेख है। इसके चारों ओर एक लोहे की बाड़ बनी हुई है। हरियाणा के राज्यपाल की अध्यक्षता में एक सोसायटी इस पर्यटन स्थल के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए कार्य कर रही है।
आम के पेड़ से निकलता था खून, काला अंब पानीपत
- फोटो : हेमंत बुद्धिराजा
काला अंब उन मराठों की याद में बनवाया गया था जिन्होंने 1761 में अहमद शाह अब्दाली के साथ पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ी थी। मराठा सेनाओं का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव और महादाजी शिंदे ने किया था। जिस जगह यह लड़ाई लड़ी गई थी, ठीक उसी जगह एक आम का पेड़ लग गया था।