विनोद अ्रगवाल
उनका ट्रांसफर मुंबई कर दिया गया। वहां पर संकीर्तन का साधन नहीं था। अपने बॉस से उन्होंने कहा कि दिल्ली बुला लो। बॉस बोले-कमाल है, सब मुंबई जाते हैं, आप दिल्ली आना चाहते हैं। इसके बाद बलदेव को पता चला कि कोई विनोद अग्रवाल नाम के बिजनेसमैन हैं, जो रविवार को अपनी गद्दी पर संकीर्तन करते हैं। जून 1988 में मुलाकात हुई। 1993 में विनोद को मुंबई से निकाला। दोनों के एक साथ ढाई सौ एलबम हैं।
फ्रंटियर मेल से मुंबई जा रहे थे...
विनोद ने एक वाकया याद करते हुए बताया था कि 1933 की बात है। वे अमृतसर से फ्रंटियर मेल में बैठकर मुंबई जा रहे थे। जगाधरी में 150 से भी ज्यादा लोग मिलने के लिए स्टेशन पर जुट गए। जबरन ट्रेन से उतार लिया। जगाधरी में श्यामा स्नेही संकीर्तन मंडल की ओर से हर रविवार को कीर्तन होता है। मुझे वहीं ले गए।