जीवन में सफलता का मूलमंत्र, अगर याद रखेंगे ये 8 बातें तो कभी भी असफलता का मुंह नहीं देखेंगे तो इन्हें रूटीन बनाइए और फर्क देखिए।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
गूगल कभी भी गुरु का स्थान नहीं ले सकता और न ही कोई किसी को पढ़ा सकता है। हर इंसान के अंदर अपना ज्ञान होता है। यहां तक की एक बच्चे के भीतर भी ज्ञान होता है। बस जरूरत होती है उस ज्ञान को सही दिशा देने की और यही काम है एक शिक्षक का। यह बातें रविवार को उपराष्ट्रपति और पंजाब यूनिवर्सिटी के चांसलर एम. वेंकैया नायडू ने कहीं।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
वह यहां विश्वविद्यालय के 67वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस दौरान उन्होंने चार ऐसी बातें बताई, जिन्हें जीवन में अपना लो तो कभी भी असफल नहीं होंगे। आगे की स्लाइड में जानिए...
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
कठोर मेहनत: कुछ न कुछ काम सभी करते हैं, लेकिन जो लोग कठोर मेहनत करते हैं, उन्हें सफलता जरूर मिलती है। कोई छोटा नहीं होता, क्योंकि छोटे ही बड़े बनते हैं। उपराष्ट्रपति एम वेंकेया नायडू ने सबसे पहले उदाहरण दिया डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का, जो अखबार बेचकर पढ़े और भारत के राष्ट्रपति बने। फिर उन्होंने उदाहरण दिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का। कहा कि वे चाय वाले के बेटे हैं। नायडू ने कहा कि वे खुद तीन किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
मां: नायडू ने कहा कि जिंदगी में कहीं भी पहुंच जाओ, लेकिन कभी अपनी मां को मत भूलना। मां ही एक ऐसा शख्स से, जिसने हमें इस दुनिया में आने का मौका दिया। मां के बगैर सब बेकार है। जन्मभूमि: देश-विदेश कहीं भी चले जाओ, लेकिन कभी जन्मभूमि को मत भूलो। मौका मिले तो जन्भूमि के लिए कुछ जरूर करो, जहां की मिट्टी में गिरकर, संभलकर और दौड़कर आप बड़े हुए हैं।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
मातृभाषा: वेंकैया नायडू ने कहा कि एक मातृ भाषा होती है, जिसे कभी नहीं भूलना चाहिए। मातृ भाषा कहीं सिखाई नहीं जाती, क्योंकि यह अंदर से निकलती है। उन्होंने कहा कि जब रूस के राष्ट्रपति आए तो उन्होंने अपनी भाषा में भाषण दिया। फ्रांस के आए तो अपनी भाषा में बोले। फिर हम क्यों अपनी मातृ भाषा को भूल जाते हैं।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
पढ़ो, कमाओ और वापस आओ
उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा कि युवाओं में विदेश जाने को लेकर की होड़ मची है, लेकिन इसकी जरूरत क्या है? सब कुछ तो है हमारे यहां। फिर भी यदि विदेश जाना ही है तो बेशक जाएं, लेकिन एक सलाह यही है कि विदेश जाएं तो वहां पढ़ें, कमाएं और वापस भारत आएं। क्योंकि भारत को अपने बच्चों की जरूरत है।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
भारत में विभिन्न धर्मों के लोगों के भगवान अलग, लेकिन जनभावना एक
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत ऐसा देश है, जहां विभिन्न धर्मों के लोगों के भगवान भी अलग-अलग हैं। विभिन्न पद्धतियों से उनकी पूजा होती है, लेकिन हम सभी देशवासियों की देश के प्रति भावना फिर भी एक है। सभी को यही सलाह है कि दिखने में, काम-काज में और तौर तरीके में हम अलग हो सकते हैं, लेकिन हैं सभी हिंदुस्तानी। हिंदू क्या है? यह एक संस्कृति है, यह जीने का एक तरीका है।
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पंजाब यूनिवर्सिटी में दीक्षांत समारोह
किताबें धर्म नहीं बनातीं
उपराष्ट्रपति ने छात्रों से कहा कि किताबें कभी धर्म नहीं बनातीं। बल्कि धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किताबें लिखी और प्रकाशित की जाती रही हैं। किसी किताब ने भगवान को नहीं बनाया, बल्कि भगवान महान किताबों की प्रेरणा बने हैं। सभी किताबों से बढ़कर, आपका आत्ममंथन है, जो दिखाता है कि आपके खुद के अंदर भगवान हैं। इसके बिना आप ऐसे गधे हो, जिस पर मीठे का बोझ तो लदा है, लेकिन उसे मिठास का अहसास नहीं है।
हक के लिए आवाज न उठे तो डिग्रियां बेकार
उपराष्ट्रपति ने कहा कि पढ़े-लिखे इंसान खासतौर से महिलाएं, अगर अपने हक के लिए आवाज न उठा पाएं तो सब बेकार है। अन्याय सहन करते रहो, शोषण का शिकार होते रहो और हिंसा बर्दाश्त करो, तो आपकी डिग्री का जिंदगी को उत्तम बनाने कोई योगदान नहीं है। इसलिए अगर पढ़ो तो क्वालिटी ऑफ लाइफ में सुधार लाओ, पहले अपनी और फिर दूसरों की।