रियो ओलंपिक में पदक जीतने के बाद महिला पहलवान साक्षी मलिक के साथ ही मोखरा गांव का नाम देश-दुनिया में छा गया। खेल महाकुंभ से लौटने के बाद उनके स्वागत में मानो पूरा रोहतक शहर और गांव उमड़ पड़ा। हर किसी के जुबान पर बस यही था कि मोखरा की बेटी ने कमाल कर दिया। इससे खुश होकर मुख्यमंत्री खट्टर ने उन्हें बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का ब्रांड एंबेसडर बना दिया।
ब्रांड एंबेसडर होने के नाते अब उन पर दारोमदार रहेगा कि कैसे प्रदेश की बेटियों को पढ़ने और उन्हें बचाने के लिए लोगों को जागरूक किया जाए। पर आंकड़े पर गौर करें तो प्रदेश के अलावा उनके खुद के गांव की स्थिति चिंताजनक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, हरियाणा का लिंगानुपात 1000 पुरुषों पर 879 और साक्षी के गांव मोखरा की स्थिति और भी खराब। वहां 1000 पुरुषों पर 834 महिलाएं।
इसी तरह यदि महिलाओं की साक्षरता दर पर बात करें तो हालत और भी दयनीय है। राष्ट्रीय 74 और हरियाणा की 76.6 फीसदी के मुकाबले मोखरा खास गांव की साक्षरता दर सिर्फ 67.5 है। इसमें महिलाओं की साक्षरता दर तो केवल 56.7 फीसदी ही है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस काम के लिए साक्षी मलिक को लगाया है, वह उनके लिए कितनी बड़ी चुनौती है। शायद ओलंपिक में मेडल जीतने से कम नहीं!
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साक्षी मलिक
- फोटो : Getty
साक्षी ने जिस गांव की मिट्टी ने इस बार के खेल महाकुंभ में देश की लाज बचाई, उसकी हालत किसी और समस्याग्रस्त गांव से जुदा नहीं। गांव की गलियां और सड़कें गाय और भैंस की गोबर से सनी हुईं पर मकान लगभग ईंट के बने हुए। उसी रास्ते से जब सरपंच सुरेंद्र मलिक के दरवाजे पर पहुंचा तो हुक्का पीने की चौकड़ी जमी थी।
सरपंच और वहां बैठे लोगों ने बताया कि साक्षी ने तो गांव का नाम रोशन कर दिया, उसे सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का ब्रांड एंबेसडर भी बना दिया पर यहां की मांगें सरकार पूरी करे तो सबका भला हो। गांव के बीचोबीच ही जलकुंभी से भरा करीब चार एकड़ में फैला जोहड़ है। इसमें पानी के साथ ही गांव की गंदगी भी जमा हो जाती है। इसमें मच्छर पनपते हैं।
लोगों का कहना है कि यह बीमारी की जड़ है। ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि यदि इस भूभाग को विकसित कर पार्क बना दिया जाए और जल निकासी के लिए ड्रेनेज सिस्टम से जोड़ दिया तो बेहतर होगा। स्वास्थ्य सेवा के बारे में बताया कि गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, जिसमें बड़े डॉक्टर की जरूरत है। इस अपग्रेड कर दिया जाए तो गांव के लोगों को बार-बार शहर का चक्कर न लगाना पड़े।
खेल सुविधा पर कहा कि फिलहाल गांव में एक छोटा सा अखाड़ा है। उसी में गांव के युवा अभ्यास करते हैं। उनका कहना था कि यदि सरकार उसी जगह एक एकड़ और जमीन मुहैया करा दे तो फिर कोई दिक्कत नहीं आएगी। हालांकि बकौल सरपंच अब मुख्यमंत्री की खेल स्टेडियम और खेल एकेडमी की घोषणा से ग्रामीण संतुष्ट हैं।
लगभग 30 हजार की आबादी और 15 हजार वोटर वाले इस गांव के लिंगानुपात, साक्षरता दर और मृत्यु दर की स्थिति के बारे में बातचीत की जाए तो हालात बेहद खराब हैं। गांव में 22 आंगनबाड़ी केंद्र हैं, पर कमोबेश स्थिति सबकी लगभग एक जैसी। सरकार आखिर क्यों कर खर्च कर रही है? गांव के आखिरी छोड़ पर बना बस अड्डा। वहीं सामने है राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय। पसीने से तरबतर क्लास में पढ़ते बच्चे।
वहां की प्रिंसिपल सरिता खनगवाल। बकौल प्रिंसिपल यहां कोई समस्या नहीं। हालांकि, बातों ही बातों में स्कूल के एक उच्च पदस्थ सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्कूल में कराए गए सर्वे के अनुसार, एक क्लास के लगभग पांच बच्चों के घर में अभी शौचालय नहीं हैं। इसको भी यदि मानक मान लिया जाए तो गांव में अभी भी 10 से 12 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है।
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अभिनेत्री परिणीता चोपड़ा बनी थी योजना की ब्रांड एंबेसडर, अब दोनों ही बनी रहेगी
- फोटो : amar ujala
हालांकि सरकार ढिंढोरा पीट रही है कि प्रदेश के गांव जल्द ही खुले में शौच मुक्त हो जाएंगे। लोगों ने बताया कि शौचालय की स्थिति तो फिर भी ठीक है, पर बिजली दिन में सिर्फ दो ही घंटे के लिए आती है। दोपहर एक से तीन बजे और रात को चार-पांच कट के साथ सात से आठ घंटे। फिर आम आदमी के अलावा बच्चे कैसे आराम से पढ़ें और चैन से सोएं?
ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर स्वदेश लौटी साक्षी मलिक
- फोटो : ani
हां, चुनौती तो है, लेकिन इससे निपटने के लिए बेहतर प्रयास किया जाएगा। लोगों को जागरूक किया जाएगा वे बेटियों को कोख में नहीं मारें और उन्हें बेहतर शिक्षा दें।
- साक्षी मलिक, भारतीय महिला पहलवान