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दुनिया का वो खूंखार तानाशाह, जो शराब से धोता था हाथ

Mon, 23 Nov 2020 09:16 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
बहुत से लोग अब शायद यकीन न करें लेकिन 60 के दशक में रोमानिया में निकोलस चाचेस्कू ने लगातार 25 सालों तक न सिर्फ अपने देश के मीडिया की आवाज नहीं निकलने दी बल्कि खाने, पानी, तेल और यहां तक कि दवाओं तक पर प्रतिबंध लगा दिया। नतीजा ये हुआ कि हजारों लोग बीमारी और भुखमरी के शिकार हो गए और उस पर तुर्रा ये कि उनकी खुफिया पुलिस 'सेक्योरिटेट' ने लगातार इस बात की निगरानी रखी कि आम लोग अपनी निजी जिंदगी में क्या कर रहे हैं। चाचेस्कू को पूरे रोमानिया में 'कंडूकेडर' के रूप में जाना जाता था जिसका अर्थ था 'नेता'। उनकी पत्नी एलीना को राष्ट्रमाता का खिताब दिया गया था।
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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
अपनी परछाई से भी डरते थे रोमानिया के लोग
रोमानिया में भारत के राजदूत रह चुके राजीव डोगरा बताते हैं कि वो जब रोमानिया गए थे तो चाचेस्कू को गए दस साल बीत चुके थे लेकिन तब भी लोगों में उनके प्रति दहशत थी। डोगरा याद करते हैं, "जब मैं अपना पद संभालने रोमानिया पहुंचा तो मैंने पाया कि लोग अपनी छाया से भी घबराते थे। वो जब सड़क पर चलते थे तो हमेशा पीछे मुड़ मुड़ कर देखते थे कि कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा।"
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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
घर की खिड़कियां खुली रखने का हुक्मएक रोमानियाई महिला कार्मेन बुगान के पिता चाचेस्कू के विरोधियों में से थे। खुफिया पुलिस सिक्योरिटेट ने 10 मार्च, 1982 को उनके गांव के घर छापा मारा और अगले पांच सालों तक परिवार ने जो कुछ किया, उस पर नजर रखी और घर के अंदर बोले गए उनके एक-एक शब्द को रिकॉर्ड किया। कार्मेन बुगान ने बीबीसी को बताया, "जब मैं स्कूल से वापस आई तो मैंने देखा कि मेरा पूरा घर पुलिस वालों से भरा हुआ था। वो मेरे पूरे घर में खुफिया माइक्रोफोन लगा रहे थे। वो मेरे माता-पिता की सिगरेट पी रहे थे और बिना पूछे अपने लिए कॉफी बना रहे थे। उस समय मुझे पता नहीं था, लेकिन बाद में मुझे पता चला कि मेरे पिता ने अपनी कार से बुखारेस्ट में चाचेस्कू के खिलाफ पर्चे बांटे थे। मेरे पिता उस समय अंडरग्राउंड थे और मेरी मां अस्पताल में थीं। वो मेरे घर का सारा खाना ले गए और मुझे तीन हफ्तों तक सिर्फ पानी पर ही जिंदा रहना पड़ा।"

कार्मेन कहती हैं, "हमें आदेश दिया गया था कि चाहे जितनी ठंड हो, हम अपने घर की खिड़कियां हमेशा खुली रखें, ताकि वो हम पर नजर रख सकें। जब मैं स्कूल जाती थी तो एक खुफिया एजेंट मेरे पीछे चलता था। मुझे उसका ब्राउन कोट और कैप अभी तक याद है। वो स्कूल छूटने तक गेट पर ही मेरा इंतजार करता था।"

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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
बड़े कद की तस्वीर दिखाने की हिदायतनाटे कद के चाचेस्कू का कद था मात्र 5 फीट 4 इंच, इसलिए पूरे रोमानिया के फोटोग्राफरों को हिदायत थी कि वो उनकी इस तरह तस्वीरें खीचें कि वो सबको बड़े कद के दिखाई दे। 70 की उम्र पार हो जाने के बाद भी उनकी वही तस्वीरें छपती थीं जो उनकी 40 साल की उम्र में खीचीं गई थीं। एलीना को तो ये तक पसंद नहीं था कि कोई सुंदर महिला उनके बगल में खड़े हो कर तस्वीर खिंचवाए। एलीना ने कई विषयों में फेल होने के बाद 14 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन रोमानिया की फर्स्ट लेडी बनने के बाद उन्होंने ऐलान करवा दिया था कि उनके पास रसायन शास्त्र में 'पीएचडी' की डिग्री है। जाहिर है ये डिग्री जाली थी।
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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
अरबों डॉलर खर्च कर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भवन बनवाया
चाचेस्कू रोमानिया को एक विश्व शक्ति बनाना चाहते थे। इसके लिए जरूरी था बड़ी जनसंख्या का होना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 'एबॉर्शन' यानी गर्भपात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसी वजह से पूरे रोमानिया में तलाक लेना भी मुश्किल बना दिया गया था। चूंकि चाचेस्कू छोटे कद के थे, वो हर चीज बड़ी पसंद करते थे। उन्होंने राजधानी बुखारेस्ट में अरबों डॉलर खर्च कर 'पीपुल्स हाउज' बनवाया था जिसका हीटिंग और बिजली का खर्च आज के जमाने में लाखों डॉलर का आता है और भवन बन जाने के 25 साल बाद भी इसके 70 फीसदी कमरे अभी तक खाली हैं। करीब 15,000 मजदूर इस भवन को बनाने में लगे हुए थे और वो तीन शिफ्टों में काम करते थे। वो अक्सर इस भवन का मुआएना करने जाते थे। दिसंबर, 1989 आते आते वो वहां सप्ताह में तीन चार बार आने लगे थे।

चाचेस्कू की जीवनी 'द लाइफ एंड ईविल टाइम्स ऑफ निकोलाई चाचेस्कू' लिखने वाले जॉन स्वीनी लिखते हैं, "15000 मजदूरों के लिए वहां एक भी 'टायलेट' नहीं था। इसलिए जहां भी किसी मजदूर को मौका मिलता, वो अपने आपको हल्का कर लेता। पूरे भवन में बुरी तरह से बदबू फैली हुई थी। जब भी चाचेस्कू के आने की खबर मिलती, मजदूरों का एक दल दौड़ कर उस इलाके की गंदगी को साफ कर देता जहां चाचेस्कू को जाना होता था। एक दिन चाचेस्कू साफ किए गए इलाके से थोड़ा भटक गए और ऐसी जगह मुड़ गए जहां थोड़ा अंधेरा था। अंधेरे में उनका पैर मल के ढेर पर पड़ा और उनके दोनों जूते इससे बुरी तरह सन गए।"
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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
दिन में बीस बार अल्कोहल से हाथ धोते थे
स्वीनी आगे लिखते हैं, "ये देख कर कुछ मजदूरों की हंसी निकल गई। लेकिन जब 'सेक्यूरिटेट' के लोगों ने उन्हें घूर कर देखा तो वो दूसरी तरफ देखने लगे। सेक्यूरिटेट का एक बंदा चासेस्कू के जूतों पर लगी गंदगी को साफ करने लगा। चासेस्कू अपने गंदे पैरों के साथ अपनी कार की तरफ बढ़े। जहां-जहां उनके कदम पड़े, उनके जूतों पर लगी गंदगी के निशान छूटते गए। किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। न ही कोई हंसा, मानो कोई एटम बम फूट गया हो।"

"कल्पना कीजिए कि चाचेस्कू का क्या हाल हुआ होगा जिनकी सफाई के प्रति इतनी दीवानगी थी कि वो 'इनफेक्शन' से बचने के लिए एक दिन में बीस बार अपने हाथ अल्कोहल से धोया करते थे। बाद में 'सिक्यूरिटेट' ने बाकायदा इसकी जांच कराई, लेकिन ये पता नहीं चल सका कि इसका जिम्मेदार कौन था। बहरहाल अफसरों को निर्देश दिए गए कि वो इसका कभी किसी से जिक्र न करें।

यह भी कहा जाता है कि चाचेस्कू को साफ-सफाई की ऐसी 'बीमारी' थी कि वह एक दिन में 20-20 बार अपने हाथ धोते थे और वो भी शराब से। दरअसल, वो डरते थे कि कहीं उन्हें इन्फेक्शन न हो जाए। इस हाथ धोने की 'बीमारी' का आलम ये था कि जब वो साल 1979 में ब्रिटेन गए थे महारानी एलिजाबेथ से मिलने, तब भी वह हर एक व्यक्ति से हाथ मिलाने के बाद शराब से अपना हाथ धोते थे। यहां तक कि उनके बाथरूम में सिर्फ हाथ धोने के लिए ही शराब की बोतल रखवा दी गई थी।
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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
खाने पर प्रतिबंध और हीटिंग पर रोक
चाचेस्कू के शासन का पूरा दौर रोमानिया की जनता के लिए अभाव का दौर था। हर जगह चीजों को लेने के लिए लंबी कतारें लगी रहती थीं कसाई की दुकानों पर मुर्गी के पैरों के अलावा कुछ भी उपलब्ध नहीं रहता था। दुकानों में फल नहीं के बराबर थे। कभी कभी कुछ सेब और आड़ू दिख जाते थे। सामान्य 'वाइन' आम लोगों की पहुंच से बाहर थी और कुछ चुनिंदा रेस्टोरेंट में ही मिल सकती थी।

फ्रैंक डिकोटेर अपनी किताब 'हाउ टू बी अ डिक्टेटर' में लिखते हैं, "सबसे बड़ी समस्या ऊर्जा की थी हर तीन में से एक बल्ब ही जला करता था और सार्वजनिक वाहनों के रविवार को चलने पर मनाही थी। चाचेस्कू ने बड़ा औद्योगिक 'बेस' बनाने के लिए पश्चिमी देशों से भारी मात्रा में तकनीक, कच्चा माल और यंत्र आयात किए थे। लेकिन 1979 में तेल की कीमतें बढ़ जाने की वजह से उन्हें कर्ज में बढ़ी दर से ब्याज देना पड़ रहा था।"

"अचानक उन्होंने सारे ऋण को तुरंत एक साथ चुकाने का फैसला लिया। नतीजा ये हुआ कि किफायती कार्यक्रम लागू किए गए। आयात कम कर दिए गए और निर्यात बढ़ा दिए गए। सोवियत संघ को मांस का निर्यात दो सालों में तिगुना कर दिया गया। फल, सब्जियां और वाइन सभी को विदेशी बाजारों के लिए भेजा जाने लगा। खाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बिजली की खपत में भारी कटौती की गई और लोग कड़कड़ाती ठंड में अंधेरे में बिना किसी हीटिंग के कांपते हुए रहने के लिए मजबूर हो गए। उस पर तुर्रा ये था कि चाचेस्कू उन्हीं लोगों से ऐहसान मानने की उम्मीद कर रहे थे जिनकी आम जिदगी को उन्होंने नर्क बना दिया था।"

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21 दिसंबर, 1989 का अंतिम भाषण
17 दिसंबर, 1979 को रोमानिया के सैनिकों ने तिमिस्वारा के प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं। इसके बाद ही पूरे देश में प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। 21 दिसंबर, 1989 को निकोलाई चाचेस्कू ने बुखारेस्ट के मध्य में पार्टी मुख्यालय की बालकनी से एक जन सभा को संबोधित किया। अभी भाषण देते कुछ ही मिनट हुए थे कि पीछे की तरफ से सीटियों और तानों की आवाजे आने लगीं। चाचेस्कू ने हाथ उठा कर और माइक को 'टैप' कर लोगों को शांत कराने की कोशिश की लेकिन पीछे से आता शोर जारी रहा। चाचेस्कू ये देख कर अवाक रह गए। उनकी पत्नी एलीना ने भी आगे बढ़ कर भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की। वो चिल्लाती रहीं, 'शांत हो जाइए। आपको क्या हो गया है?'

लेकिन भीड़ पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। अपनी रूखी आवाज में उन्होंने माइक पर ही अपने पति को सलाह दी कि न्यूनतम वेतन को बढ़ाने का ऐलान कर दो। उन्होंने ये किया भी लेकिन भीड़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा और थोड़ी देर में जनसभा दंगे में तब्दील हो गई।

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क्रांति की शुरुआत
इस भाषण को टेलिविजन पर लाइव दिखाया जा रहा था। जैसे ही टेलिविजन का पर्दा ब्लैंक हुआ, हर एक ने महसूस किया कि क्रांति की शुरुआत हो रही है। पूरे देश में लोग विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गए। हर जगह सरकारी भवनों पर हमले किए जाने लगे और चाचेस्कू की तस्वीरें फाड़ी जाने लगीं। चाचेस्कू ने 'सिक्यूरिटेट' को विद्रोह को कुचलने का आदेश दिया। पूरी रात उन्होंने विद्रोहियों पर गोलियां चलाईं लेकिन वो उन्हें दबाने में असफल रहे।

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रोमानिया का तानाशाह निकोलय चाचेस्कू - फोटो : Social media
भागते समय लिफ्ट में फंसे
अगले दिन सेना भी विद्रोह में शामिल हो गई। गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने पार्टी मुख्यालय को घेरना शुरू कर दिया। एलीना और चाचेस्कू को हेलिकॉप्टर से भागना पड़ा। लेकिन यहां भी ड्रामा जारी रहा। चाचेस्कू लिफ्ट से भवन की छत पर गए जहां एक हेलिकॉप्टर उनका इंतजार कर रहा था। जॉन स्वीनी अपनी किताब 'द लाइफ एंड इविल टाइम्स ऑफ निकोलाई चाचेस्कू' में लिखते हैं, "जैसे ही चाचेस्कू लिफ्ट में घुसे, उनके सेनाध्यक्ष जनरल स्टैनकुलुस्कू कार में बैठ कर रक्षा मंत्रालय की तरफ रवाना हो गए।"

"अपनी कार से ही उन्होंने सुरक्षा बलों को आदेश दिए कि वो भवन की रक्षा करना रोक दें। जैसे ही सैनिक वहां से हटे क्रांतिकारी भवन में घुसना शुरू हो गए। लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि चाचेस्कू अभी भी भवन के अंदर मौजूद हैं, क्योंकि उनकी लिफ्ट के दरवाजे जाम हो चुके थे। किसी तरह लिफ्ट के दरवाजे को तोड़ कर चाचेस्कू को निकाला गया। जैसे ही क्रांतिकारी छत पर पहुंचे, छह लोगों को लिए 'इकूरिऊ' हेलिकॉप्टर ने वहां से उड़ान भरी। हेलिकॉप्टर में इतनी कम जगह थी कि पायलट के साथी को बैठने के लिए चाचेस्कू के घुटनों का सहारा लेना पड़ा।"
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क्रूर अंत
पायलट ने हेलिकॉप्टर राजधानी बुखारेस्ट के बाहर एक खेत में उतारा और वो चाचेस्कू दंपत्ति को उनके एक अंगरक्षक के साथ छोड़ कर वापस उड़ गया। उसी दिन चाचेस्कू और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया। क्रिस्मस के दिन दोनों पर एक सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। दोनों के हाथ बांध कर एक दीवार के सामने खड़ा किया गया। पहले दोनों को अलग अलग गोली मारी जानी थी, लेकिन एलीना ने कहा कि वो साथ साथ मरना पसंद करेंगे। सैनिकों ने निशाना लिया और 25 सालों तक रोमानिया पर राज करने वाला निरंकुश तानाशाह निकोलाई चाचेस्कू धराशाई हो गया। मार्क्सवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स ने एक बार बिल्कुल सही कहा था "लोग अपना इतिहास खुद बनाते हैं लेकिन इतिहास कभी उनकी पसंद से नहीं बनता।"
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