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Wolf vs Human: आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

Mon, 16 Sep 2024 04:31 PM IST
धर्मेंद्र सिंह फीचर डेस्क, अमर उजाला
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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : अमर उजाला
जयसिंह रावत

Wolf vs Human: शायद ही कोई होगा जिसने ''भेड़िया आया ...भेड़िया आया'' की कहानी न सुनी हो। न जाने कब से यह कहानी सीख के तौर पर बच्चों को सुनाई जाती रही है। इन दिनों भेड़िया सचमुच कहानी से बाहर निकल कर बहराइच में लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा रहा है। देखा जाय तो भेड़िया को शेर और बाघ जैसे मांसाहारी जानवरों की तरह अत्यंत खूंखार माना जाता रहा है। धूर्त, मक्कार और खतरनाक इंसान की तुलना भेड़िये से की जाती है। जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है।

विशेषज्ञ भेड़िये को बहुत शर्मीला और मनुष्य से बच कर रहने वाला मानते हैं। वास्तव में बच्चों पर कुछ हमलों के अलावा किसी वयस्क पर हमले का दृष्टान्त अब तक नहीं मिलता था। भेड़िये के काल्पनिक खौफ और उसके प्रति इंसान की बदले की भावना के कारण प्रकृति का यह एक महत्वपूर्ण जीव अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है। इसकी आबादी भारत में 3 हजार से कम रह गयी है। इसीलिये वन्यजीव अधिनियम में बाघ और शेरों के साथ इसे भी अति संरक्षित जीवों की सूची एक में रखा गया है। लेकिन संरक्षण तो रहा दूर उसे बचाने के भी कोई उपाय नजर नहीं आते।
 
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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : Freepik
 25 साल बाद फिर भेड़ियों का खौफ

उत्तर प्रदेश में 1996-97 के बाद पहली बार भेड़ियों का इतने बड़े पैमाने पर आतंक देखा जा रहा है। ''इंटरनेशनल सेंटर फॉर वोल्फ'' के ताजा अंक में छपे एक शोध के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्ष 1996 में बच्चों पर भेड़ियों के हमले अपने चरम पर पहुंचे। उस समय भेडियों ने 76 बच्चों पर हमले किये थे जिनमें से 50 बच्चों की मौतें हो गयीं थी। उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी वर्ष 1997, 1998 और 1999 में बच्चों पर हमलों की घटनाएं दर्ज हुयीं। 
 
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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : Freepik
दरअसल यह मामला भी मानव वन्यजीव संघर्ष का ही है जिसमें आप अकेले भेड़िये को गुनाहगार नहीं मान सकते। अगर दशकों बाद भेड़िया फिर मानव जीवन के लिये संकट बनकर बाहर निकला है तो इस समस्या का समाधान भेड़ियों की नस्ल को समाप्त करना नहीं बल्कि इंसान और भेड़िया के बीच संघर्ष को समाप्त करना है ताकि दोनों ही जीवित रहें। धरती का हर जीव जरूरी है और अगर धरती पर खूंखार मांसाहारियों और शाकाहारियों में संन्तुलन बिगड़ गया तो शाकाहरी जीव वनस्पति जगत का विनाश कर डालेंगे। इसीलिये उनकी संख्या नियंत्रित करने के लिये प्रकृति ने मांसाहारियों का श्रृजन किया है। भारतीय भेड़िया दुनिया में जीवित भेड़ियों की सबसे प्राचीन वंशावली और भारत में इसकी वंशावली 8 लाख साल मानी जाती है।
 

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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : Freepik
अस्तित्व के संकट से जुझ रहा भेड़िया वंश

देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान में वन्यजीव विशेषज्ञ बिलाल हबीब के अनुसार वर्तमान में उपमहाद्वीप में भेड़ियों की संख्या का कोई प्रमाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। 2003 में किये गये दो आनुवंशिक अध्ययनों से पता चला था कि भारतीय उपमहाद्वीप में तीन हजार भेड़िया वंश मौजूद हैं। उस समय माना गया था कि देश में लगभग 350 हिमालयी भेड़िये जंगल में थे और शेष भारतीय भेड़ियों की आबादी 1,000 से 3,000 के बीच थी। जबकि इतिहासकार महेश रंगराजन के अनुसार, प्राचीन अभिलेखों से पता चलता है कि 1875 और 1925 के बीच 2,00,000 भेड़ियों की खालें एकत्र की गई थीं।
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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : Freepik
जाहिर है कि उस समय भारत में भेड़ियों की संख्या कई लाख में रही होगी। एक अनुमान के अनुसार उस समय भारत में वन क्षेत्र लगभग 3.47 करोड़ हेक्टेयर था जो कि भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की 2021 की वनस्थिति रिपोर्ट के अनुसार, 32,87,469 हेक्टेयर रह गया।

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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : Freepik
कुत्तों द्वारा भेड़ियों से कहीं अधिक लोग मारे जाते हैं

भारतीय वन्यजीव संस्थान के ही डीन पद पर रहे जानेमाने वन्यजीव वैज्ञानिक यादवेन्द्र देव सिंह झाला अपने एक लेख में कहते हैं कि भेड़िये बेहद शर्मीले और मायावी जानवर हैं जो इंसानों के संपर्क से बचने की कोशिश करते हैं। भारत में मनुष्यों पर भेड़ियों के हमलों को असामान्य बताते हुये झाला लिखते हैं कि तीन दशकों में ऐसी घटनाएं केवल एक 1980 के दशक में बिहार में और दूसरी 1996-97 में उत्तर प्रदेश में दर्ज हुयी हैं। (बहराइच की घटना नवीनतम् है।)


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आखिर क्यों इंसानों के दुश्मन बन गए हैं भेड़िये? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स - फोटो : Freepik
झाला कहते हैं कि भारतीय भेड़िए का वजन औसतन 18 किलाग्राम तक होता है जो कि पालतू कुत्तों जर्मन शेफर्ड और लैब्राडोर के आधे जितना होता है। इसलिये भेड़िये से एक वयस्क व्यक्ति को कोई खतरा नहीं होता जबकि बाघ, गुलदार, हाथी और जंगली सुअरों द्वारा हर साल बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं। यहां तक कि भारत में जंगली कुत्तों द्वारा भेड़ियों से कहीं अधिक लोग मारे जाते हैं। फिर भी भेड़िये को आदमखोर के रूप में बदनाम किया जाता है।
 

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संरक्षित भेड़िया मारने पर नहीं हुई किसी को सजा

वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय भेड़िये ने अपने प्राकृतिक शिकार और आवास का चार-पांचवां हिस्सा मानवीय गतिविधियों के कारण खो दिया है। बाघ, शेर और हाथी के विपरीत भेड़िये को बचाने के लिए सरकार द्वारा प्रायोजित कोई योजना नहीं है। इसका उल्लेख वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची एक में है, जो इसे कागज पर बाघ के समान ही संरक्षण प्रदान करता है। हालांकि, इस कानून का क्रियान्वयन भेड़िये की तरह ही मायावी है।

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भेड़ियों के असहाय शावकों को मारने के लिए उनके बिलों में जहर देकर और धुआं करके मारा जाता है। भारत में ऐसा एक भी मामला नहीं हुआ है जिसमें किसी व्यक्ति पर भेड़िये को मारने के लिए मुकदमा चलाया गया हो, जबकि बाघों के शिकार की तुलना में ऐसा अक्सर होता है।
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भोजन के संकट से बदल रही है उनकी प्रवृत्ति

भरतीय भेड़िया (कैनिस ल्यूपस पैलिप्स) कंटीले जंगलों, झाड़ियों, शुष्क और अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में रहता है। भेडिया भारत के अर्ध-शुष्क कृषि और चारागाहों वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले मांसाहारी जानवरों में से एक है। भेड़, बकरी और कुत्ते जैसे छोटे पशुओं के लालच में यह घने जंगलों के बजाय आबादी के निकट रहता है। ग्रामीण भारत में पालतू पशुओं की बहुतायत वाले क्षेत्रों में बुढापे, दुर्घटना या बीमारी के कारण मवेशियों के मर जाने पर लोग गांव के निकट ही मृत पशुओं को फेंक देते हें जो कि भेड़ियों, लकड़बग्घों और सियारों जैसे मांसाहारियों के भोजन के काम आते हैं। भेड़िये मवेशियों के लालच में चारागाहों के निकट भी छिपे रहते है। इसलिये ये ग्रामीणों के दुश्मन बने रहते हैं। भेड़ियों की अधिकांश मौतें इन्हीं क्षेत्रों में होती है। जबकि भेड़ियों द्वारा नुकसान के मुआवजे की व्यवस्था भारत में नहीं है।
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