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आखिर वायरस को मारने वाली दवा बनाना मुश्किल क्यों होता है?

Mon, 29 Mar 2021 10:09 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
वैश्विक महामारी कोरोना वायरस इन दिनों देश में एक बार फिर से बेकाबू हो चुकी है। बीते 24 घंटों में इसके संक्रमण के 62 हजार से भी अधिक नए मामले सामने आए हैं। इसके साथ ही महाराष्ट्र में कोरोना वायरस का बल म्यूटेंट वेरिएंट मिलने से स्वास्थ विशेषज्ञ आशंकित हैं और उन्हें इस बात का डर है कि ग्राफ और ऊपर जा सकता है। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच सवाल ये भी उठ रहा है कि नए-नए तकनीक और मेडिकल की उत्तम टीम होने के बावजूद भी अब तक दुनिया का कोई देश वायरस की दवा निकालने का दावा क्यों नहीं कर पा रहा है? क्या वारस की दवा बनाने में काफी वक्त लगता है या फिर ये मुमकिन ही नहीं है?
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
इस सवाल का जवाब पाने के लिए पहले हमें वायरल दवाओं के बारे में समझना होगा। एंटीवायरल ड्रग्स वे प्रेसक्राइब्ड दवाएं हैं, जो फ्लू से लड़ने के लिए दी जाती हैं। ये टैबलेट, कैप्सूल, सीरप, पाउडर या इंट्रावीनस यानी नसों के जरिए भी दी जाती हैं। हालांकि, ऐसी दवाएं कभी भी ओवर द काउंटर नहीं मिल सकती हैं। सिर्फ डॉक्टर ही ऐसी दवाएं लिख सकते हैं। बता दें कि बीमारी शुरू होने के  48 घंटे के भीतर अगर एंटीवायरस शुरू हो जाए, तो ठीक होने की सबसे ज्यादा संभावना रहती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एंटीवायरल ड्रग्स बैक्टीरियल बीमारी को दो तरह से खत्म करती हैं। ये दवाएं दो तरह से काम करती हैं, पहला बैक्टीरिया पर सीधा हमला कर उन्हें खत्म कर देती है और दूसरा बैक्टीरिया को बढ़ने से रोक देती है। WHO के मुताबिक, एंटीवायरल ड्रग्स हर साल करोड़ों लोगों की जान बचाती है। हालांकि, एंटीवायरल दवाओं को बनाना थोड़ा मुश्किल है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दरअसल, कोई भी वायरस शरीर की कोशिकाओं में ही घर बनाते हैं और उसी के जरिए मल्टीप्लाई होना शुरू करते हैं। वायरस का प्रोटीन शरीर में उपस्थित स्वस्थ कोशिका से जुड़ता है और इस पहली कोशिका को होस्ट सेल कहते हैं। इसके बाद वायरस होस्ट सेल का सिस्टम अपने कब्जे में ले लेता है और लगातार बढ़ने लगता है। ऐसे में वायरस शरीर की बहुत सी स्वस्थ कोशिकाओं को बीमार करते जाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
एंटीवायरल ड्रग्स कारगर उसी समय होती हैं, जब ये वायरस की लाइफ साइकल को तोड़ सकें। लेकिन समस्या यह है कि वायरस शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं में बसेरा डालता है, इसलिए वायरस को खत्म करने के लिए दी जाने वाली दवा शरीर की कोशिकाओं को भी मार सकती है। वायरस को मारना जितना आसान है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है होस्ट सेल को बचाए रखना।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
बता दें कि सफल एंटीवायरल दवा वही होती है, जो वायरस की संरचना पर ऐसे हमला करे कि मरीज के शरीर की कोशिकाओं को कम से कम नुकसान हो। इंफ्लूएंजा की दवा इसके लिए एक बेहतरीन उदाहरण है। ये दवा सीधे वायरस के एंजाइम पर हमला बोलते हैं, ताकि संक्रमण की गति एकदम धीमी हो जाए।
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