भारत में यहूदी
- फोटो : सोशल मीडिया
भारतीयों से कैसे घुल-मिल गए यहूदी?
माना जाता है कि यहूदी भारत में तकरीबन 1800 साल पहले आए थे। अलीबाग के पास नौगांव तट पर जहाज के क्षतिग्रस्त होने बाद वो लोग यहां किनारे पर आए। इसके बाद वो यहीं बस गए और उन्होंने तेल निकालने का अपना पुराना काम जारी रखा। शनिवार (शब्बाथ) को छुट्टी लेने की वजह से कोंकण में उन्हें 'शनवार तेली' कहा गया। उस समय हिंदू तेली सोमवार को छुट्टी लिया करते थे ताकि हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव का वाहन माने जाने वाले नंदी (बैल) से उस दिन काम न करवाना पड़े।
भारत में बेने इसराइली, बगदादी, बेने मनाशे, और कोचीन के यहूदी समूह हैं। बेने इसराइलियों ने स्थानीय संस्कृति में घुल-मिलकर रहना शुरू किया। वो जिस गांव में बसे, उसी गांव का नाम अपनाया। राजपूरकर, तलकर, नौगावकर, दांडेकर, दिवेकर, रोहेकर, पेणकर, पेझारकर, झिराडकर, चेऊलकर, अष्टमकर, आपटेकर, आवासकर, चिंचोलकर, चांडगावकर ऐसे 350 कुलनाम (सरनेम) मराठी यहूदी समुदाय में है। ये लोग खुद को 'बेने इसरायली' यानी 'इसराइल की संतान' कहने लगे।
स्थानीय लोगों को बहुत समय तक इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। फिर डेविड रहाबी नाम के शख्स कोकण में आए। उनके यहां आने का समय अब से हजार डेढ़ हजार साल के बीच माना जाता है, कोई पक्की तिथि नहीं मिलती। डॉक्टर इरेन ज्यूडा ने 'इवोल्यूशन ऑफ द बेने इसराइली ऐंड देयर सिनेगॉग्स इन द कोकण' नाम की किताब में डेविड रहाबी के बारे में लिखा है। डेविड रहाबी ने देखा कि इन लोगों का बर्ताव और खान-पान यहूदियों जैसा है।
उन्होंने शापूरकर, झिराडकर और राजपूरकर परिवार से तीन लोगों को चुना और उन्हें प्रशिक्षित किया। इन तीनों के लिए उन्होंने 'काजी' शब्द का इस्तेमाल किया। कुछ वक्त बाद यहूदी समुदाय शिक्षा के बाद धर्मग्रंथ भी पढ़ने लगा।