फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारत के इस गांव में रहते हैं बउवा ही बउवा, शाहरुख की तरह बनना चाहते हैं 'जीरो'

Sat, 22 Dec 2018 02:41 PM IST
गौरव शुक्ला फीचर डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 6
dwarf village in assam - फोटो : Social Media
इन दिनों फिल्म जीरो के बाद बउवा को जानने की जिज्ञासा लोगों की लगातार बढ़ती जा रही है। आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जहां सब बउवा ही हैं, यानी बउवा की तरह ही दिखने वाले बौने लोग। 
विज्ञापन

2 of 6
प्रतीकात्मक तस्वीर
दरअसल, भारत के असम में बौने लोगों का अनोखा गांव बसा है। बौनों के गांव को अमार गांव यानी हमारा गांव भी कहा जाता है। बचपन में आपने लिलिपुट आइलैंड को किताबों में तो पढ़ा ही होगा। भारत-भूटान सीमा से कोई तीन-चार किलोमीटर पहले अमार नाम के इस गांव में 70 लोग रहते हैं। दूसरे गांवों के लोग इसे बौनों का गांव कहते हैं और गांव को बसाने वाले पबित्र राभा को बौनों का सरदार माना जाता है। अमार में किसी भी शख्स की ऊंचाई साढ़े तीन फीट से ज्यादा नहीं है। यहां कोई अपनी इच्छा से रहने आया है तो किसी को उसी के परिवार वाले यहां छोड़कर गए हैं।
विज्ञापन

3 of 6
- फोटो : Social Media
अमार गांव के लोगों का कद भले ही छोटा हो लेकिन इनकी सोच और इरादे पहाड़ जितने ऊंचे हैं। यहां के ये बौने लोग दिन में खेतीबाड़ी करते हैं और शाम होते ही रंगमंच के कलाकार के तौर पर नजर आने लगते हैं और शुरू हो जाता है नाटक का दौर। 

4 of 6
A Theatre Village for Dwarfs - फोटो : Social Media
ये गांव दुनिया में होते हुए भी दुनिया से अलग है। आसपास के लोग जब यहां आते हैं तो छोटे कद की इस नाटक मंडली के नाटक देखकर इनकी जमकर तारीफ भी करते हैं। पूरे गांव में दो मंजिला लकड़ी के घर हैं, जिनमें ये लोग रहते हैं। 
विज्ञापन

5 of 6
अपने कलाकारों के साथ बौनों के सरदार पबित्र राभा। - फोटो : Social Media
इस गांव को बसाने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। बताया जाता है कि अमार गांव को 2011 में बौनों के सरदार पबित्र राभा ने बसाया था। राभा नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से निकले रंगमंच कलाकार हैं। यह वही संस्थान है जिसनें ओमपुरी, इरफान खान, नवाजुद्दीव सिद्दीकी जैसे न जाने कितने मंझे कलाकार बॉलीवुड को दिए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
- फोटो : Social Media
पबित्र राभा ने एनएसडी से निकलने के बाद रंगमंच को बढ़ावा देने की सोची और उन्होंने इन छोटे कद के लोगों को कलाकार बनाने की ठानी। शुरुआत में स्थानीय लोगों ने राभा और इन सभी लोगों का मजाक उड़ाया। किसी ने बौनों का देश कहा, तो किसी ने बौनों की मंडली, लेकिन राभा ने इन लोगों का हौसला बढ़ाया और उन्हें मंझा हुआ कलाकार बनाया। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें