फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

हिरोशिमा और नागासाकीः परमाणु हमले में जीवित बची महिलाओं की कहानी

Fri, 07 Aug 2020 05:36 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
1 of 5
परमाणु बम विस्फोट के बाद हिरोशिमा - फोटो : सोशल मीडिया
75 साल पहले 6 और 9 अगस्त को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर अमरीका ने परमाणु बमों से हमला किया था। ऐसा माना जाता है कि इस हमले में हिरोशिमा की 3,50,000 की आबादी में से करीब 1,40,000 लोग मारे गए थे। दूसरी ओर, नागासाकी में करीब 74,000 लोग मारे गए थे। इस बमबारी ने एशिया में दूसरे विश्व युद्ध को अचानक खत्म कर दिया था। जापान ने 14 अगस्त 1945 को आत्मसमर्पण कर दिया था। लेकिन, आलोचकों का कहना है कि जापान पहले ही सरेंडर करने की कगार पर था। इस बमबारी में जीवित बचे लोगों को हिबाकुशा कहा जाता है। जीवित बचे लोगों को परमाणु बम के हमले के बाद शहरों में रेडिएशन और मनोवैज्ञानिक मुश्किलों से गुजरना पड़ा था।

2 of 5
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
ब्रिटेन के फोटो-जर्नलिस्ट ली कैरेन स्टो की खासियत इतिहास की अहम घटनाओं की गवाह रही महिलाओं की कहानियां पेश करने में रही है। स्टो ने 75 साल पहले परमाणु बम हमले में जीवित बची तीन महिलाओं के फोटो लिए और उनके साथ बातचीत की है। इस आर्टिकल में कुछ ऐसे ब्योरे हैं जो कि कुछ लोगों को परेशान कर सकते हैं।

3 of 5
तेरुको उएनो की बेटी तोमोको और नातिन कुनीको साल 2015 की एक तस्वीर में - फोटो : LEE KAREN STOW
तेरुको उएनो
तेरुको 15 साल की थीं जब वह 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा में हुए परमाणु बम हमले में जीवित बच गईं। बमबारी के वक्त पर तेरुको हिरोशिमा रेड क्रॉस हॉस्पिटल में नर्सिंग स्कूल में दूसरे साल में थीं। बम के टकराने के बाद अस्पताल की डॉरमेटरी में आग लग गई। तेरुको ने लपटों को बुझाने की कोशिश की, लेकिन उनके कई साथी छात्र इसमें जलकर मर चुके थे। हमले के बाद के हफ्ते की उनकी याद्दाश्त केवल इतनी है कि उन्होंने दिन-रात लगकर बुरी तरह से जख्मी हुए लोगों का इलाज किया जबकि उनके पास खाने-पीने के सामान न के बराबर थे।

ग्रेजुएशन के बाद तेरुको हॉस्पिटल में काम करती रहीं, जहां उन्होंने स्किन ग्राफ्ट के ऑपरेशंस में मदद दी। मरीज की जांघ से खाल लेकर इसे जलने की वजह से विकसित होने वाले केलोइड जख्म वाली जगह पर ग्राफ्ट किया जाता था। बाद में उनकी शादी तत्सुयुकी से हुई जो खुद भी परमाणु बम हमले में जीवित बच गए थे। जब तेरुको गर्भवती हुईं तो उन्हें चिंता हुई कि क्या उनका बच्चा स्वस्थ होगा और क्या वह जीवित बच पाएगा या नहीं। उनकी बेटी तोमोको पैदा हुईं और उनका स्वास्थ्य अच्छा था।

वे कहती हैं, "मुझे नर्क के बारे में नहीं पता, लेकिन जिस सब से हम गुजरे शायद वही नर्क है। ऐसा फिर कभी नहीं होना चाहिए।" वे कहती हैं कि परमाणु हथियारों को खत्म करने की दिशा में पहला कदम स्थानीय सरकारी नेताओं को उठाना चाहिए।

4 of 5
एमिको अपनी मां फुकु नाकासाको की गोद में और बगल में उनकी बहन मीको - फोटो : COURTESY OF EMIKO OKADA
एमिको ओकाडा
एमिको उस वक्त आठ साल की थीं जब हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया गया। उनकी बड़ी बहन मीको और चार अन्य रिश्तेदारों की इसमें मौत हो गई। एमिको और उनके परिवार के कई फोटोग्राफ्स नष्ट हो गए थे, कुछ तस्वीरें जो कि उनके रिश्तेदारों के यहां रखी थीं वे बची रह गईं। इनमें से कुछ तस्वीरें उनकी बहन की भी थीं।

एमिको कहती हैं, "मेरी बहन उस सुबह घर से बाद में मिलती हूं कहकर निकली थीं। वे केवल 12 साल की थीं।" लेकिन, वे फिर कभी वापस नहीं लौटीं। किसी को भी नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ? मेरे पेरेंट्स ने पूरी ताकत से उन्हें खोजने की कोशिश की। उन्हें उनकी बॉडी कभी नहीं मिल पाई। हालांकि, उनका कहना है कि वे अभी भी कहीं पर जीवित होंगी। मेरी मां उस वक्त प्रेग्नेंट थीं, लेकिन उनका गर्भपात हो गया। हमारे पास खाने के लिए भी कुछ नहीं था। हमें रेडिएशन के बारे में तब कुछ नहीं पता था, ऐसे में हमें जो भी मिला हमने वह सब उठा लिया।"

वे बताती हैं कि उस वक्त खाने की जुगाड़ सबसे बड़ी समस्या थी। लोग चोरी करने लगे थे। पानी स्वादिष्ट लगता था। शुरुआत में लोगों को ऐसे ही दिन काटने पड़े। फिर मेरे बाल गिरना शुरू हो गए। मुझे हमेशा थकान रहती थी। मैं हमेशा पड़ी रहती थी। 12 साल बाद उन्हें एप्लास्टिक एनीमिया बीमारी निकली। वे कहती हैं, "हर साल कुछ दफा ऐसे मौके आते हैं जबकि सूरज ढलने के वक्त आसमान सुर्ख लाल हो जाता है। इतना लाल कि लोगों के चेहरे लाल होने लगते हैं। उस वक्त मुझे परमाणु बम हमले के दिन की शाम याद आ जाती है। तीन दिन और तीन रातों तक शहर जलता रहा था। मुझे सूरज ढलने से नफरत है। अभी भी सनसेट से मुझे जलता हुआ शहर याद आ जाता है।"
विज्ञापन

5 of 5
रीको जब पांच साल की थी और दूसरी तस्वीर साल 2015 की - फोटो : LEE KAREN STOW
रीको
उस सुबह हवाई हमले की चेतावनी जारी हुई थी। इस वजह से रीको घर पर ही रुक गई थीं। जब यह लगा कि सब ठीक है तो वे पड़ोस के मंदिर चली गईं जहां पर उनके पड़ोस के बच्चे पढ़ने के लिए आया करते थे। बार-बार हवाई हमलों की चेतावनी के चलते बच्चे स्कूल जाने की बजाय मंदिर में पढ़ने के लिए इकट्ठा होते थे। 40 मिनट बाद शिक्षकों ने कक्षा बंद कर दी और रीको घर आ गईं।

रीको बताती हैं, "मैंने घर के अंदर पांव रखा ही होगा कि अचानक मेरी आंखें तेज रोशनी से कौंध गईं। यह पीली और नारंगी रंग की थी। मैं कुछ भी समझ नहीं पाई।।।तब तक सबकुछ सफेद हो गया। अगले ही पल एक जोरदार धमाका हुआ। मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। हमें एयर रेड शेल्टर के बारे में बताया गया था। ऐसे में मुझे जैसे ही होश आया मैंने अपनी मां की तलाश की और हम लोग पड़ोस के एयर-रेड शेल्टर में पहुंच गए। मुझे खरोंच तक नहीं आई थी। मैं माउंट कोनपीरा की वजह से बच गई थी, लेकिन पहाड़ के दूसरी तरफ के लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे। वहां भीषण तबाही हुई थी।

मेरी मां ने चादरें और तौलिए लिए और दूसरी महिलाओं के साथ पास के कमर्शियल कॉलेड में पहुंच गईं। वहीं पर काफी लोग इकट्ठा हुए थे। कुछ लोगों ने पानी मांगा। मुझे उन्हें पानी देने के लिए कहा गया। मैंने एक कटोरा उठाया और पास की नदी से उसे भरा और उन्हें पीने के लिए दे दिया। पानी का घूंट पीते ही वे मर गए। एक के बाद एक लोग मरते गए। गर्मियों का वक्त था और कीड़े और बदबू के डर से शवों का तुरंत अंतिम संस्कार करना पड़ा।
Next
AU ऐप में पढ़ें